भाई साहब बीच कार्यक्रम में पहुँचे थे।
तेज़ चलकर आए होंगे। ललाट पर चमकता पसीना बता रहा था।
हॉल में पहुंचकर उन्होंने देखा। आगे की पंक्ति में कुर्सियाँ खाली हैं। उनके चेहरे से यह भाव व्यक्त हो रहा था, मानो चमत्कार हो गया हो। देर से आने के बाद भी कुर्सी मिल जाना चमत्कार ही तो माना जाएगा। वे इतमीनान से बैठ गये। लेकिन भीतर इतमीनान नहीं हो पाया था। किसी आशंका से घिरे लग रहे थे। कभी बाएँ देखें-कभी दाएँ। गायन सामने चल रहा था तो मंच की ओर देखना जरूरी ही था। बीच-बीच में पीछे भी देख रहे थे।
कुलमिलाकर उन्हें अभी भी शंका थी कि यहाँ बैठे रहा जा सकता है या नहीं। कहीं कोई बीच में आकर उठा न दे। इस पंक्ति में तो वीआइपी बैठते रहे होंगे। कहीं उनको ऐसा तो नहीं लग रहा कि गलत कार्यक्रम में आ गये। एक चमत्कार कितनी तरह की शंकाएँ अपने साथ लेकर आता है।
कार्यक्रम खत्म होने तक उनके पसीने कम नहीं हुए। एसी युक्त हॉल में पसीना उनकी स्थिति को बयान कर रहा था।
Wednesday, September 23, 2026
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