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Monday, July 25, 2011

ना जाने किस शहर में हूं

घर में हूं
दफ्तर में हूं
ना जाने
किस शहर में हूं

Sunday, November 21, 2010

अच्‍छे लोग

4 बजकर 20 मिनट हुए हैं
आसमान में बादल हैं
सूरज कुछ फीका

अच्‍छे लोगों की बैठक में
अच्‍छे लोग गले मिल रहे है

बैठक से जाते हुए
एक अच्‍छे आदमी ने
दूसरे के बारे में कहा कि
...... वह अच्‍छा नहीं है

दूसरे आदमी को भी पहले आदमी के बारे में
ठीक यही कहते हुए सुना गया

बैठक से पहले भी
दूसरे देश, काल, परिस्थिति में
उन्‍होंने एक दूसरे के बारे में ऐसा ही कहा था

अच्‍छे लोगों की आंखों में चमक है
आर्किमिडीज़ की तरह
वे मुस्‍कुराते हुए बता रहे हैं कि
अच्‍छे लोग ऐसे ही होते हैं

अच्‍छे लोग बता रहे हैं
इस तरह बनती है अच्‍छी दुनिया
जिसमें हमें रहना है ।

निशांत

Saturday, July 17, 2010

ताकि बोल सकें

मौन
बहुधा अच्छा है
बस
आदत नहीं पड़नी चाहिए

Friday, December 18, 2009

इम्‍तहान

चेहरे
सपाट
सन्‍नाटा है
परिसर में फैला
वितान भय का
बच्‍चे किताब हो गए हैं ।

Tuesday, November 3, 2009

एक रात सपने में मिले सद्दाम

फाइव स्टार होटल के गलियारे में सिगार सुलगाते हुए

वे स्वस्थ थे, जैसे कैद से पहले आजाद इराक में थे

इराक अब नहीं था उनकी जुबान पर

अब वह एक पर्यटक थे

उन्होंने कहा - हम सितारों में हैं - आज यहाँ कल वहां

कौन रोक सकता है हमें ???

उन्होंने मेजबानों की फेहरिस्त दिखाई

और उडानों के टिकेट भी

होगा कहीं इराक सिगार के धुएँ में

सपने में सद्दाम कहीं और का सपना देख रहे थे !

निशांत, २००३

राष्ट्रवाद एक छाता है

राष्ट्रवाद एक छाता है
किल कमानियों पर कसा
आंधी और बूंदों से थरथराता

कई बरसातों तक चल जाती है
उसकी यह संरचना

एक नहीं कई जमातों को बचाती या कि
वंचित रखती नैसर्गिक बूंदाबांदी से
सवाल तब उठता है जब बरसात न हो
और धूप नरम हो ----
निशांत, दिल्ली २००३

Friday, October 2, 2009

एक दिन बस स्‍टॉप पर

एक ही शहर में बहुत दिनों तक गुम रहने के बाद
दोनों मिले

मिले तो मीठा कुछ, ठंडा कुछ, कुछ गरम गरम
उनके भीतर बहुत कुछ घटा
उबला

फिर वे उसी तरह बात करते घूमते रहे
गलियों में
जैसे बचपन की गलियों में जा पहुंचे हों

गली जहां मुड्ती है उसी जगह घर है उनका
जहां लौट सकते हैं निशंक, बैठ सकते हैं बिना किसी चिंता के
कि रात की रोटी कहां से आएगी
कल के बस का किराया भी
कहीं नहीं था उनके बीच

वह तो भला हो आउटर मुद्रिका का
जिसके तेज हार्न से उनकी तंद्रा टूटी
और उन्‍होंने देखा कि
अरे। हम तो एक ही बस स्‍टॉप पर खड़े हैं
जबकि
हमें जाना है विपरीत दिशाओं में
और पता नहीं घर पर सब्‍जी है या नहीं

कि कल तो फिर निकलना है दिहाड़ी पर

इस तरह कुछ देर ठिठके सकुचाते
एक दूसरे से हाथ मिलाते हुए
वे सड़क पर विदा हुए

कि
अगली बार जल्‍दी मिलेंगे
बातें बहुत सारी रह गयी हैं
जिन पर बात करनी है

वे जाते हुए हवा में हाथ उठाए
तेज आवाज में एक दूसरे से कुछ कह रहे थे
लेकिन गाडि़यां थीं कि उन्‍हें ओझल किये जा रही थीं
.....;

Monday, November 17, 2008

बच्‍चों के बारे में

बच्‍चों के बारे में
बनाई गईं ढेर सारी योजनाएं
ढेर सारी कविताएं
लिखी गईं बच्‍चों के बारे में

बच्‍चों के लिए
खोले गए ढेर सारे स्‍कूल
ढेर सारी किताबें
बांटी गईं बच्‍चों के लिए

बच्‍चे बड़े हुए
जहां थे
वहां से उठ खड़े हुए

बच्‍चों में से कुछ बच्‍चे
हुए बनिया हाकिम
और दलाल
हुए मालामाल और खुशहाल

बाकी बच्‍चों ने सड़क पर कंकड़ कूटा
दुकानों में प्‍यालियां धोईं
साफ किया टट्टीघर
खाए तमाचे
बाज़ार में बिके कौडि़यों के मोल
गटर में गिर पड़े

बच्‍चों में से कुछ बच्‍चों ने
आगे चलकर
फिर बनाईं योजनाएं
बच्‍चों के बारे में
कविताएं लिखीं
स्‍कूल खोले
किताबें बांटीं
बच्‍चों के लिए
गोरख पांडेय
यह कविता हाल ही में बाल विज्ञान पत्रिका चकमक के नवंबर अंक के कवर पेज पर प्रकाशित हुई है।

Friday, July 25, 2008

कुआं

कभी कभी लगता है कि इस तरह की कविता का क्‍या मतलब है। लेकिन कविताएं हैं कि बस मतलब से ही नहीं आतीं। वे अपने साथ आपके अनुभव को बड़ा करती हैं। बीज का अंकुरण आपने देखा होगा। उसके लिए एक शब्‍द है 'अंखुआना', संभवत: यह अंकुरण का अपभ्रंश है। अनुभव की प्रक्रिया भी अंखुआने से होती है और इस दौर में कई तरह की अनुभूतियों से हम गुजरते हैं।

कुआं

हर बार
आई है प्‍यास तुम तक
प्‍यासी ही लौट गई है
सोचकर,
कि तुम्‍हारा पानी न कम हो
जगत पर उगी दूब न कुचले
प्‍यास आई है
प्‍यासी ही लौट गयी है
- निशांत, 1992-93, वाराणसी

Friday, May 9, 2008

जहां आती हो धूप जीने भर

कहाजाता है न कि हर लेखक की शुरुआत कविता से होती है। मेरा यह मानना है कि लिखने और पढ़ने की ओर आकर्षण बिना कविता के हो ही नहीं सकता। बचपन में हम सभी के कानों में अपनी मातृबोलियों और भाषाओं के गीत ही पड़े होंगे। कुछ के यहां बहुत सुघढ़ रूप और अंदाज में और कुछ के यहां अनगढ़, अस्‍पष्‍ट अंदाज में। शायद यही कारण है कि हम भी जब बोलने, अभिव्‍यक्‍त करने लायक होते हैं तो वही सुर ताल पकड़ने की काशिश करते हैं।
बनारस हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के हिन्‍दी विभाग में (संभवत: अब रीडर होंगी) डॉ चंद्रकला त्रिपाठी की एक नन्‍हीं सी कविता के भावार्थ आज भी कानों में गूंजते रहते हैं ' बच्‍चे जैसे जैसे बड़े होते हैं हंसना भूल जाते हैं ---
हंसना, सिर्फ एक अभिव्‍यक्ति नहीं है वह कविता की तरह है। बहरहाल अभी हम हंसने और रोने पर विचार नहीं कर रहे हैं। कहना यह है कि हम सब की शुरुआत कविता और गीत से होती है। कुछ लोग इस माध्‍यम को ईश्‍वर की नेमत मान अपना लेते हैं और कुछ लोग समय और समाज के दबाव में उससे किनारा कर लेते हैं। कुछ लोग इस तलाश में रह जाते हैं कि कविता है क्‍या चीज और इस खोज में कविताएं लिखते जाते हैं । पता नहीं कविता के शिखर चूमने के बाद भी वे कविता को परिभाषित कर पाते हैं या नहीं। अपन किनारा कर चुके लोगों में से हैं।
कवियों की संगत में कविता खोजता हुआ, कविता को पहचानने की कोशिश करता हुआ मैं भी दो चार पंक्तियां लिखने की कोशिश कर लिया करता था। मेरे यहां कविता का लंबा अकाल आता रहा है। इस भय से कि पता नहीं कवि लोग इसे कविता मानेंगे या नहीं कभी सुनाने का साहस नहीं हुआ। पोथी में धरे धरे अब उन पर जंग लग रही है (चाहें तो सुविधा के अनुसार उन्‍हे दीमक चाट रहे हैं भी कह सकते हैं )। बहरहाल,कविता के पहले बसंत की कुछ कविताएं जैसे जैसे मिलती जाएंगी यहां साया करने की कोशिश करूंगा। उन दिनों हमारी टोली भी हुआ करती थी (जैसे तमाम स्‍वप्‍नजीवी युवाओं की होती है) कविता, पेंटिंग,नुक्‍कड़ नाटक और जाने क्‍या क्‍या और 'समाधान' नाम की इस टोली में इस कवि को निशांत के नाम से जाना जाता था। कुछ ही दिन पहले विश्‍वविद्यालय छोड़ने के लगभग 14 साल बाद परिसर में लौटा तो जैसे बहुत कुछ ताजा हो गया। फिलहाल पेश है यह कविता...

...जिजीविषा...

जब से जन्‍मा हूं
तलाशता रहा हूं छांव
जहां रोप सकूं अपने पांव
जहां आती हो धूप
जीने भर
जहां मिलता हो प्‍यार
सीने भर
- निशांत, काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय 1990

Saturday, May 3, 2008

लगता नहीं है दिल मेरा .....

इसे बंदे की नादानी ही समझा जाए कि ... उम्रे दराज मांग के ... जैसे शेर को गुनगुनाने का मौका तो कई बार आया लेकिन यह पता नहीं कि यह शेर हिन्‍दुस्‍तान के अंतिम बादशाह सिराजुद्दीन ख़ान, मुहम्‍मद अबू ज़फ़र बहादुर शाह ग़ाज़ी, आलमपनाह, शहंशाह का है।
खुशवंत सिंह की एक किताब है दिल्‍ली, दिल्‍ली की कहानी बयान करने के दरम्‍यान वे खुशरो, मीर, सादी आदि के साथ्‍ा कई शायरों को अपने पात्रों के जरिये याद करते करते हैं। और जब सल्‍तनत का शाहंशाह ही भला शायर हो तो उसे कैसे भूल सकते हैं। बहादुर शाह ज़फ़र को उन्‍होंने खूब कोट किया है। इसी क्रम में मेरी अज्ञानता भी दूर हुई। 82 साल के उम्र में अंग्रेजों की कैद में कालापानी को जा रहे शाहंशाह ने अपनी बातें कुछ इस तरह कही हैं -

लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार1 में,
किसकी बनी है आलमे- नापाएदार2 में।

बुलबुल को पासबां से न सैयाद3 से गिला,
किस्मलत में कै़द थी लिखी फ़स्ले बहार4 में।

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहां है दिले – दाग़दार में ।

इक शाख़े –गुल5 पे बैठ के बुलबुल है शादमां6,
कांटे बिछा दिए हैं दिले – लालाज़ार7 में ।

उम्रे – दराज मांगकर लाए थे चार दिन,
दो आरजू में कट गए, दो इंतजार में ।

है कितना बदनसीब 'जफ़र' दफ़न के लिए,
दो गज़ जमीं भी मिल न सकी कुए-यार8 में।
1.नगर 2.नश्वर संसार 3.शिकारी 4.वसंत ऋतु 5.फूलों की डाली 6.खुश 7.दिल का बागीचा 8.यार की गली

Sunday, April 6, 2008

समय के जोकर

निलय उपाध्‍याय के दूसरे संग्रह कटौती में एक कवि‍ता है जोकर। तकरीबन दस साल पहले लिखी गयी इस कविता की सामयिकता चूकी नहीं है अभी। हमारे समय और सत्‍ता के अंदाज का सटीक बयान है यह कविता। बाकी आप फैसला करेंगे। पेश है कविता
जोकर

सबसे पहले किसे जलील करते हैं जोकर ?
खुद को
उसके बाद किसको जलील करते हैं?
समाजियों और नर्तकों को
और उसके बाद ?

उसके बाद
बहुत आक्रामक हो जाती है जोकर मुद्रा
वे हंसते हुए उतार लेते हैं
देवताओं के कपड़े

जो जानते हैं अश्‍लीलता की ताकत
और समाज में
उसे सिद्ध करने की कला
सिर्फ जोकर नहीं होते

Thursday, August 30, 2007

ब्रजेश्‍वर मदान की कविताएं

लिखना कब शुरू हुआ आपका, यह लेखकों और कवियों से पूछा जानेवाला एक आम सवाल है। कुछ कवि इसे बड़ी नफासत से कहते हैं - हम लिखते नहीं कविताएं हममें अभिव्‍यक्‍त होती हैं। हम तो निमित्‍त मात्र हैं। किसी कवि के जरिए कब उसकी श्रेष्‍ठ कविता अभिव्‍यक्‍त होती है यह अंदाज लगाना मुश्किल है। पिछले कुछ समय से ब्रजेश्‍वर जी बड़ी ही खुबसूरत कविताएं लिख रहे हैं, बिल्‍कुल नए अंदाज में। पहले हंस में और फिर राष्‍ट्रीय सहारा के इतवारी परिशिष्ट में उनकी कविताएं साया हुई हैं। प्रस्‍तुत हैं बीते इतवार को राष्‍ट्रीय सहारा में आईं कुछ कविताएं

गोलक

पाब्‍लो नेरूदा की कविता में
गोलक जैसे वक्ष पढ्कर
गोलक का नया अर्थ जाना
गोलक जो बचपन में
होता था हमारा बैंक
डालते थे उसमें
अठन्नियां चवन्नियां
जो भी जेबखर्च मिलता था
उससे बचाकर और इंतजार करते थे
उसके भरने का

नेरूदा की कविता से यह
नया अर्थ जाना
कि जहां सुनी जा सकती थी
दिल की धड़कन
उसमें करके सुराख
सुनते रहे सिक्‍कों की आवाज
यों सोचकर
याद आई देह और धरती की गंध
याद आया गांव
जहां मिटटी के दीयों में
फूलती थी सरसों
अब तो इस शहर में
हो गए हैं बरसों
जहां सिक्‍कों के शोर में
खो गई है जीवन की भोर । ।

एक बार

एक लड़की मिलती है एक दिन
एक लड्के से और
करने लगती है प्रेम
और फिर एक दिन
चली जाती है
उसे टूटे हुए जहाज के
डेक पर छोड्कर
फिर उसकी जिंदगी में
वह सब होता है
जो होता सबकी जिंदगी में
शादी, बेटे-बेटियां
पोते-पोतियां भी
लेकिन नहीं होता प्रेम
और मरते दम तक वह
किसी को पता नहीं चलने देती
कि जीवन एक बार उसने भी जिया था ।

अहिल्‍या

वह मेरा भ्रम था कि
फर्श पर पड़ी गठरी
बदल गई लड़की में
दरअसल
वह लड्की थी
जो इफ्तार से पहले की
नमाज अदा करके उठी थी
फर्श से।
भ्रम था मेरा
लेकिन मैं उस पर
यकीन करना चाहते था कि
अब भी बदल सकता है
कोई पेड्, कोई पत्‍थर
किसी औरत में
जैसे अहिल्‍या बदल गई थी
पत्‍थर से और में
एक स्‍पर्श से।।