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Monday, November 26, 2012

बन रही है आम आदमी की पार्टी

समाचार4मीडिया से साभार 
पुण्य प्रसून वाजपेयी, वरिष्ठ पत्रकार
दफ्तर-एआईसी यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत। पता-ए-119 कौशांबी। पहचान-बंद गली का आखिरी मकान। उद्देश्य-राजनीतिक व्यवस्था बदलने का आखिरी मुकाम अरविन्द केजरीवाल। कुछ यही तासीर...कुछ इसी मिजाज के साथ इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले अन्ना हजारे से अलग होकर सड़क पर गुरिल्ला युद्द करते अरविन्द केजरीवाल। किसी पुराने समाजवादी या वामपंथी दफ्तरों की तरह बहस-मुहासिब का दौर। आधुनिक कम्प्यूटर और लैपटाप से लेकर एडिटिंग मशीन पर लगातार काम करते युवा। और इन सब के बीच लगातार फटेहाल-मुफलिस लोगों से लेकर आईआईटी और बिजनेस मैनेजमेंट के छात्रों के साथ डाक्टरों और एडवोकेट की जमात की लगातार आवाजाही। अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते समाजसेवी से लेकर ट्रेड यूनियन और बाबुओं से लेकर कारपोरेट के युवाओं की आवाजाही। कोई वालेन्टियर बनने को तैयार है तो किसी के पास लूटने वालों के दस्तावेज हैं। कोई अपने इलाके की लूट बताने को बेताब हैं। तो कोई केजरीवाल के नाम पर मर मिटने को तैयार है। और इन सबके बीच लगातार दिल्ली से लेकर अलग अलग प्रदेशों से आता कार्यकर्ताओं का जमावड़ा, जो संगठन बनाने में लगे हैं। जिले स्तर से लेकर ब्लाक स्तर तक। एकदम युवा चेहरे।
मौजूदा राजनीतिक चेहरों से बेमेल खाते इन चेहरों के पास सिर्फ मुद्दों की पोटली है। मुद्दों को उठाने और संघर्ष करने का जज्बा है। कोई अपने इलाके मे अपनी दुकान बंद कर पार्टी का दफ्तर खोल कर राजनीति करने को तैयार है। तो कोई अपने घर में केजरीवाल के नाम की पट्टी लगा कर संघर्ष का बिगुल फूंकने को तैयार है। और यही सब भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत[एआईसी] के दफ्तर में आक्सीजन भी भर रहा है और अरविन्द केजरीवाल का लगातार मुद्दों को टटोलना। संघर्ष करने के लिये खुद को तैयार रखना और सीधे राजनीति व्यवस्था के धुरंधरों पर हमला करने को तैयार रहने के तेवर हर आने वालों को भी हिम्मत दे रहा है।

संघर्ष का आक्सीजन और गुरिल्ला हमले की हिम्मत यह अलख भी जगा रहा है कि 26 नवंबर को पार्टी के नाम के ऐलान के साथ 28 राज्यों में संघर्ष की मशाल एक नयी रोशनी जगायेगी। और एआईसी की जगह आम आदमी की पहचान लिये आम आदमी की पार्टी ही खास राजनीति करेगी। जिसके पास गंवाने को सिर्फ आम लोगो का भरोसा होगा और करने के लिये समूची राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव। दिल्ली से निकल कर 28 राज्यों में जाने वाली मशाल की रोशनी धीमी ना हो इसके लिये तेल नहीं बल्कि संघर्ष का जज्बा चाहिये और अरविन्द केजरीवाल की पूरी रणनीति उसे ही जगाने में लगी है। तो रोशनी जगाने से पहले मौजूदा राजनीति की सत्ताधारी परतों को कैसे उघाड़ा जाये, जिससे रोशनी बासी ना लगे। पारंपरिक ना लगे और सिर्फ विकल्प ही नहीं बल्कि परिवर्तन की लहर मचलने लगे। अरविन्द केजरीवाल लकीर उसी की खींचना चाहते हैं। इसीलिये राजनीतिक तौर तरीके प्रतीकों को ढहा रहे हैं।
जरा सिलसिले को समझें। 2 अक्टूबर को राजनीतिक पार्टी बनाने का एलान होता है। 5 अक्तूबर को देश के सबसे ताकतवर दामाद राबर्ट वाड्रा को भ्रष्टाचार के कठघरे में खड़ा करते हैं। 17 अक्तूबर को भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के जमीन हड़पने के खेल को बताते हैं। 31 अक्तूबर को देश के सबसे रईस शख्स मुकेश अंबानी के धंधे पर अंगुली रखते हैं और नौ नवंबर को हवाला-मनी लैंडरिंग के जरीये स्विस बैक में जमा 10 खाताधारकों का नाम बताते हुये मनमोहन सरकार पर इन्हें बचाने का आरोप लगाते हैं। ध्यान दें तो राजनीति की पारंपरिक मर्यादा से आगे निकल कर भ्रष्टाचार के राजनीतिकरण पर ना सिर्फ निशाना साधते हैं बल्कि एक नयी राजनीति का आगाज यह कहकर करते है कि , "हमें तो राजनीति करनी नहीं आती"। यानी उस आदमी को जुबान देते हैं जो राजनेताओं के सामने अभी तक तुतलाने लगता था। राजनीति का ककहरा राजनेताओं जैसे ही सीखना चाहता था। पहली बार वह राजनीति का नया पाठ पढ़ रहा है। जहां स्लेट और खड़िया उसकी अपनी है। लेकिन स्लेट पर उभरते शब्द सत्ता को आइना दिखाने से नहीं चूक रहे। तो क्या यह बदलाव का पहला पाठ है। तो क्या अरविन्द केजरीवाल संसदीय सत्ता की राजनीति के तौर तरीके बदल कर जन-राजनीति से राजनीतिक दलों पर गुरिल्ला हमला कर रहे हैं। क्योंकि आरोपों की फेरहिस्त दस्तावेजों को थामने के बावजूद अदालत का दरवाजा खटखटाने को तैयार नहीं है। केजरीवाल चाहें तो हर दस्तावेज को अदालत में ले जाकर न्याय की गुहार लगा सकते हैं। लेकिन न्यायपालिका की जगह जन-अदालत में जा कर आरोपी की पोटली खोलने का मतलब है राजनीति जमीन पर उस आम आदमी को खड़ा करना जो अभी तक यह सोचकर घबराता रहा कि जिसकी सत्ता है अदालत भी उसी की है। और इससे हटकर कोई रास्ता भी नहीं है। लेकिन केजरीवाल ने राजनीतिक न्याय को सड़क पर करने का नया रास्ता निकाला। वह सिर्फ सत्ताधारी कांग्रेस ही नहीं बल्कि विपक्षी भाजपा और बाजार अर्थव्यवस्था के नायक अंबानी पर भी हमला करते हैं। यानी निशाने पर सत्ता के वह धुरंधर हैं, जिनका संघर्ष संसदीय लोकतंत्र का मंत्र जपते हुये सत्ता के लिये होता है। तो क्या संसदीय राजनीति के तौर तरीकों को अपनी बिसात पर खारिज करने का अनूठा तरीका अरविन्द केजरीवाल ने निकाला है। यानी जो सवाल कभी अरुंधति राय उठाती रहीं और राजनेताओं की नीतियों को जन-विरोधी करार देती रहीं। जिस कारपोरेट पर वह आदिवासी ग्रामीण इलाकों में सत्ता से लाइसेंस पा कर लूटने का आरोप लगाती रहीं । लेकिन राजनीतिक दलों ने उन्हें बंदूकधारी माओवादियों के साथ खड़ा कर अपने विकास को कानूनी और शांतिपूर्ण राजनीतिक कारपोरेट लूट के धंधे से मजे में जोड़ लिया। ध्यान दें तो अरविन्द केजरीवाल ने उन्हीं मु्द्दों को शहरी मिजाज में परोस कर जनता से जोड़ कर संसदीय राजनीति को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। तरीकों पर गौर करें तो जांच और न्याय की उस धारणा को ही तोड़ा है, जिसके आधार पर संसदीय सत्ता अपने होने को लोकतंत्र के पैमाने से जोड़ती रही। और लगातार आर्थिक सुधार के तौर तरीकों को देश के विकास के लिये जरुरी बताती रही। यानी जिस आर्थिक सुधार ने झटके में कारपोरेट से लेकर सर्विस सेक्टर को सबसे महत्वपूर्ण करार देकर सरकार को ही उस पर टिका दिया उसी नब्ज को बेहद बारिकी से केजरीवाल की टीम पकड़ रही है। एफडीआई के सीधे विरोध का मतलब है विकास के खिलाफ होना। लेकिन एफडीआई का मतलब है देश के कालेधन को ही धंधे में लगाकर सफेद बनाना तो फिर सवाल विकास का नहीं होगा बल्कि कालेधन या हवाला-मनीलैडरिंग के जरीये बहुराष्ट्रीय कंपनी बन कर दुनिया पर राज करने के सपने पालने वालों को कटघरे में खड़ा करना। स्विस बैंक खातों और एचएसबीसी बैकिंग के कामकाज पर अंगुली उठी है तो सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार पर सरकार के फेल होने भर का नहीं है। बल्कि जिस तरह सरकार की आर्थिक नीति विदेशी बैंको को बढ़ावा दे रही हैं और आने वाले वक्त में दर्जनों विदेशी बैंक को सुविधाओं के साथ लाने की तैयारी वित्त मंत्री चिदबरंम कर रहे हैं, बहस में वह भी आयेगी ही। और बहस का मतलब सिर्फ राजनीतिक निर्णय या नीतियां भर नहीं हैं या विकास की परिभाषा में लपेट कर सरकार के परोसने भर से काम नहीं चलेगा। क्योंकि पहली बार राजनीतिक गुरिल्ला युद्द के तौर तरीके सड़क से सरकार को चेता भी रहे हैं और राजनीतिक व्यवस्था को बदलने के लिये तैयार भी हो रहे हैं।
यह अपने आप में गुरिल्ला युद्द का नायाब तरीका है कि दिल्ली में बिजली बिलों के जरीये निजी कंपनियो की लूट पर नकेल कसने के लिये सड़क पर ही सीधी कार्रवाई भुक्तभोगी जनता के साथ मिलकर की जाये। और कानूनी तरीकों से लेकर पुलिसिया सुरक्षा को भी घता बताते हुये खुद ही बिजली बिल आग के हवाले भी किया जाये और बिजली बिल ना जमा कराने पर काटी गई बिजली को भी जन-चेतना के आसरे खुद ही खम्बो पर चढ़ कर जोड़ दिया जाये। और सरकार को इतना नैतिक साहस भी ना हो कि वह इसे गैर कानूनी करार दे। जिस सड़क पर पुलिस राज होता है वहां जन-संघर्ष का सैलाब जमा हो जाये तो नैतिक साहस पुलिस में भी रहता। और यह नजारा केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट की लूट के बाद सड़क पर उतरे केजरीवाल और उनके समर्थकों के विरोध से भी नजर आ गया। तो क्या भ्रष्टाचार के जो सवाल अपने तरीके से जनता के साथ मिलकर केजरीवाल ने उठाये उसने पहली बार पुलिस से लेकर सरकारी बाबुओं के बीच भी यही धारणा आम कर दी है कि राजनेताओं के साथ या उनकी व्यवस्था को बनाये-चलाये रखना अब जरुरी नहीं है। या फिर सरकार के संस्थानों की नैतिकता डगमगाने लगी है। या वाकई व्यवस्था फेल होने के खतरे की दिशा में अरविन्द केजरीवाल की राजनीति समूचे देश को ले जा रही है। यह सवाल इसलिये बड़ा है क्योकि दिल्ली में सवाल चाहे बिजली बिल की बढ़ी कीमतो का हो या सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट का विकलांगों के पैसे को हड़पने का। दोनों के ही दस्तावेज मौजूद थे कि किस तरह लूट हुई है। पारंपरिक तौर-तरीके के रास्ते पर राजनीति चले तो अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। जहां से सरकार को नोटिस मिलता। लेकिन अरविन्द केजरीवाल ने इस मुद्दे पर जनता के बीच जाना ही उचित समझा। यानी जिस जनता ने सरकार को चुना है या जिस जनता के आधार पर संसदीय लोकतंत्र का राग सत्ता गाती है,उसी ने जब सरकार के कामकाज को कटघरे में खड़ा कर दिया तो इसका निराकरण भी अदालत या पुलिस नहीं कर सकती है। समाधान राजनीतिक ही होगा। जिसके लिये चुनाव है तो चुनावी आधार तैयार करते केजलीवाल ने बिजली और विकलांग दोनों ही मुद्दे पर जब यह एलान किया कि वह जेल जाने को तैयार हैं लेकिन जमानत नहीं लेंगे तो पुलिस के सामने भी कोई
चारा नहीं बचा कि वह गिरफ्तारी भी ना दिखायी और जेल से बिना शर्त सभी को छोड़ दे।
जाहिर है अरविन्द केजरीवाल ने जनता की इसी ताकत की राजनीति को भी समझा और इस ताकत के सामने कमजोर होती सत्ता के मर्म को भी पकड़ा। इसीलिये मुकेश अंबानी के स्विस बैंक से जुडते तार को प्रेस कॉन्फ्रेन्स के जरीये उठाने के बाद मुकेश अंबानी के स्विस बैक खातों के नंबर को बताने के लिये जन-संघर्ष [राजनीतिक-रैली] का सहारा लिया। और रैली के जरीये ही सरकार को जांच की चुनौती दे कर अगले 15 दिनो तक जनता के सामने यह सवाल छोड़ दिया कि वह सरकारी जांच पर टकटकी लगाये रहे।
साफ है राजनीतिक दल अगर इसे "हिट एंड रन "या "शूट एंड स्कूट" के तौर पर देख रही हैं या फिर भाजपा का कमल संदेश इसे भारतीय लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश मान रहा है तो फिर नया संकट यह भी है कि अगर जनता ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को चुनाव में खारिज कर दिया तो क्या आने वाले वक्त में चुनावी प्रक्रिया पर सवाल लग जायेंगे। और संसदीय राजनीति लोकतंत्र की नयी परिभाषा टटोलेगी जहा उसे सत्ता सुख मिलता रहे। या फिर यह आने वाले वक्त में सपन्न और गरीब के बीच संघर्ष की बिसात बिछने के प्रतीक है। क्योंकि अरविन्द केजरीवाल को लेकर काग्रेस हो या भाजपा या राष्ट्रीय राजनीति को गठबंधन के जरीये सौदेबाजी करने वाले क्षत्रपो की फौज, जो सत्ता की मलाई भी लगातार खा रही है सभी एकसाथ आ खड़े हो रहे हैं। साथ ही कारपोरेट से लेकर निजी संस्थानों को भी लगने लगा है राजनीतिक सुधार का केजरीवाल उन्हें बाजार अर्थवयवस्था से बाहर कर समाजवाद के दायरे में समेट देगा। तो विरोध वह भी कर रहा है।
तो बड़ा सवाल यह भी है कि चौमुखी एकजुटता के बीच भी अरविन्द केजरीवाल लगातार आगे कैसे बढ़ रहे हैं। न्यूज चैनल बाइट या इंटरव्यू से आगे बढ़कर घंटों लाइव क्यों दिखा रहा है। अखबारों के पन्नो में केजरीवाल का संघर्ष सुर्खिया क्यों समेटे है। जबकि कारपोरेट का पैसा ही न्यूज चैनलो में है। मीडिया घरानों के राजनीतिक समीकरण भी हैं। कई संपादक और मालिक उन्हीं राजनीतिक दलों के समर्थन से राज्यसभा में हैं, जिनके खिलाफ केजरीवाल लगातार दस्तावेज के साथ हमले कर रहे हैं। फिर भी ऐसे समाचार पत्रों के पन्नों पर वह खबर के तौर पर मौजूद हैं। न्यूज चैनलो की बहस में हैं। विशेष कार्यक्रम हो रहे हैं। जाहिर है इसके कई तर्क हो सकते हैं। मसलन मीडिया की पहचान उसकी विश्वसनीयता से होती है। तो कोई अपनी साख गंवाना नहीं चाहता। दूसरा तर्क है आम आदमी जिस तरह सडक पर केजरीवाल के साथ खड़ा है उसमें साख बनाये रखने की पहली जरुरत ही हो गई है कि मीडिया केजरीवाल को भी जगह देते रहें। तीसरा तर्क है इस दौर में मीडिया की साख ही नहीं बच पा रही है तो वह साख बचाने या बनाने के लिये केजरीवाल का सहारा ले रहा है । और चौथा तर्क है कि केजरीवाल भ्रष्टाचार तले ढहते सस्थानों या लोगों का राजनीतिक व्यवस्था पर उठते भरोसे को बचाने के प्रतीक बनकर उभरे हैं तो राजनीतिक सत्ता भी उनके खिलाफ हैं, वह भी अपनी महत्ता को बनाये रखने में सक्षम हो पा रहा है। और केजरीवाल के गुरिल्ला खुलासे युद्द को लोकतंत्र के कैनवास का ही एक हिस्सा मानकर राजनीतिक स्वीकृति दी जा रही है। क्योंकि जो काम मीडिया को करना था, वह केजरीवाल कर रहे हैं। जिस व्यवस्था पर विपक्ष को अंगुली रखनी चाहिये थी, उसपर केजरीवाल को अंगुली उठानी पड़ रही है। लोकतंत्र की जिस साख को सरकार को नागरिकों के जरीये बचाना है, वह उपभोक्ताओं में मशगूल हो चली है और केजरीवाल ही नागरिकों के हक का सवाल खड़ा कर रहे हैं। ध्यान दें तो हमारी राजनीतिक व्यवस्था में यह सब तो खुद ब खुद होना था जिससे चैक एंड बैलेंस बना रहे। लेकिन लूट या भ्रष्टाचार को लेकर जो सहमति अपने अपने घेरे के सत्ताधारियों में बनी उसके बाद ही सवाल केजरीवाल का उठा है। क्योंकि आम आदमी का भरोसा राजनीतिक व्यवस्था से उठा है, राजनेताओं से टूटा है। जाहिर है यहां यह सवाल भी खड़ा हो सकता है कि केजरीवाल के खुलासों ने अभी तक ना तो कोई राजनीतिक क्षति पहुंचायी है ना ही उस बाजार व्यवस्था पर अंकुश लगाया है जो सरकारों को चला रही हैं। और आम आदमी ठगा सा अपने चुने हुये नुमाइन्दों की तरफ अब भी आस लगाये बैठा है। फिर केजरीवाल ने झटके में व्यवसायिक-राजनीति हितों के साथ खड़े होने वाले संपादकों की सौदेबाजी के दायरे को बढ़ाया है। क्योंकि केजरीवाल के खुलासों का बडा हथियार मीडिया भी है और मीडिया हर खुलासे में फंसने वालों के लिये तर्क गढ भी सकता है और केजरीवाल के हमले की धार भोथरी बनाने की सौदेबाजी भी कर सकता है। यानी अंतर्विरोध के दौर में लाभ उठाने के रास्ते हर किसी के पास है और अंतरविरोध से लाभ राजनेता से लेकर कारपोरेट और विपक्ष से लेकर सामाजिक संगठनों को भी मिल सकता है। यह सभी को लगने लगा है। लेकिन सियासत और व्यवस्था की इसी अंतर्विरोध से पहली बार संघर्ष करने वालों को कैसे लाभ मिल रहा है, यह दिल्ली से सटे एनसीआर के कौशाबी में बंद गली के आखिरी मकान में चल रहे आईएसी के दफ्तर से समझा जा सकता है। जहां ऊपर नीचे मिलाकर पांच कमरों और दो हाल में व्यवस्था परिवर्तन के सपने पनप रहे हैं। सुबह से देर रात तक जागते इन कमरों में कम्प्यूटर और लैपटॉप पर थिरकती अंगुलियां। कैमरे में उतरी गई हर रैली और हर संघर्ष के वीडियो को एडिटिंग मशीन पर परखती आंखें। हर प्रांत से आये भ्रष्टाचार की लूट में शामिल नेताओं के दस्तावेजो को परखते चेहरे। और इन सब के बीच दो-दो चार के झुंड में बहस मुहासिबो का दौर। बीच बीच में एकमात्र रसोई में बनती चाय और बाहर ढाबे ये आती दाल रोटी। यह राजनीतिक संघर्ष की नयी परिभाषा गढ़ने का केजरीवाल मंत्र है। इसमें जो भी शामिल हो सकता है हो जाये..दरवाजा हमेशा खुला है।
समाचार4मीडिया से साभार

Monday, November 15, 2010

आतंकवाद पर विमर्श - दो

'आतंकवाद पर समाजवैज्ञानिक विमर्श एकांगी हैं'

''साहित्य उस व्यक्ति की चेतना के उन तत्त्वों के प्रति संवेदनशील हो सकता है, उनको सम्बोधित कर सकता है जो कि इन सारी चीज़ों के प्रति वध्य बना दिये गये होते हैं। साहित्य उन स्थलों की पहचान कर सकता है जो कि हमेशा ही वध्य होते हैं, या जिनके वध्य होने की सम्भावना समाज में हमेशा होती है। वह वध्यता जो कि मनुष्यता की अनिवार्य पहचान है; धर्म के प्रति, जाति के प्रति, विचारधाराओं के प्रति, पन्थों और मतों के प्रति उसकी संवेदनशीलता। उन नाजुक, वध्यस्थलों को समझने का, और उनकी नज़ाकत को चरितार्थ करने का काम साहित्य कर सकता है। वह अपने पाठक को उस व्यक्ति के प्रति भी संवेदनशील बना सकता है जिस व्यक्ति के प्रति इस तरह की घटनाएँ हमारे समाज को असंवेदनशील बना देती हैं, जोकि इन घटनाओं का सबसे दारुण पक्ष है, क्योंकि यह असंवेदनशीलता भी कहीं न कहीं उन घटनाओं के कारकों में योगदान करती है।''

प्रस्‍तुत है आतंकवाद पर दीपेन्‍द्र और मदन सोनी के बीच हुए संवाद यानी मित्र संवाद की दूसरी कड़ी

दीपेन्‍द्र : ‘आतंकवाद’ पर केन्द्रित ख़ासकर समाजवैज्ञानिक विमर्शों में ‘आतंकवाद’ को समझने की एक तरह से विचारधारात्मक एकांगी दृष्टि दिखायी देती है। मनुष्य की चेतना के भीतर घटित हो रही घटनाओं के सूक्ष्म विवरण उनमें नहीं होते। इसलिए परिस्थितियों के मर्म को समझने में उनसे विशेष मदद नहीं मिलती। इसके बरक्स साहित्य में इस संघटना को बहुत से कोणों से, बहुआयामी और संष्लिष्ट दृष्टि से, देखे जाने की सम्भावना दिखती है। इस संघटना के सन्दर्भ में साहित्य के ‘रेस्पॉन्स’ का क्या रूप हो सकता है?

मदन: ‘आतंकवाद’ के सन्दर्भ में साहित्य की प्रतिश्रुति कम से कम दो तरह की हो सकती है। इनमें से एक तो वही है जो गीतांजलि श्री के उपन्यास में उभरती है, जो उस चेतना को लेखे में लेता है जिसे हम ‘आतंकवाद’ की शिकार चेतना के रूप में पहचानते हैं। पर मुझे लगता है कि एक और महत्त्वपूर्ण ढंग हो सकता है, और वह उस व्यक्ति के मर्म में पैठने का होगा जो कि् ‘आतंकवाद’ का एक तरह से अनपहचाना शिकार है, यानी वह व्यक्ति जिसे ‘आतंकवादी’ गतिविधि का उपकरण बनाया जाता है; वह जो ‘आतंकवाद’ को उसके अन्तिम रूप में अंजाम देता है; जिसे किसी तरह का भौतिक या आध्यात्मिक लालच देकर यह कार्रवाई करायी गयी है। उस वाहक के मनोविज्ञान में, उसके आत्म में, उसके मर्म में पैठने की कोशिश कोई कर सकता है, तो वह, मुझे लगता है, साहित्य ही है। जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं, यह व्यक्ति भी उस कार्रवाई का शिकार होता है, और तब भी होता है जबकि वह एक ‘मानव-बम’ नहीं होता। साहित्य उस व्यक्ति की चेतना के उन तत्त्वों के प्रति संवेदनशील हो सकता है, उनको सम्बोधित कर सकता है जो कि इन सारी चीज़ों के प्रति वध्य बना दिये गये होते हैं। साहित्य उन स्थलों की पहचान कर सकता है जो कि हमेशा ही वध्य होते हैं, या जिनके वध्य होने की सम्भावना समाज में हमेशा होती है। वह वध्यता जो कि मनुष्यता की अनिवार्य पहचान है; धर्म के प्रति, जाति के प्रति, विचारधाराओं के प्रति, पन्थों और मतों के प्रति उसकी संवेदनशीलता। उन नाजुक, वध्यस्थलों को समझने का, और उनकी नज़ाकत को चरितार्थ करने का काम साहित्य कर सकता है। वह अपने पाठक को उस व्यक्ति के प्रति भी संवेदनशील बना सकता है जिस व्यक्ति के प्रति इस तरह की घटनाएँ हमारे समाज को असंवेदनशील बना देती हैं, जोकि इन घटनाओं का सबसे दारुण पक्ष है, क्योंकि यह असंवेदनशीलता भी कहीं न कहीं उन घटनाओं के कारकों में योगदान करती है। साहित्य इस तरह ‘आतंकवाद’ के इर्दगिर्द एक अधिक मानवीय विमर्श बुन सकता है।

दीपेन्द्र: मुझे तॉल्स्तॉय की कहानी ‘क्रूज़र सोनाटा’ याद आती है जिसमें एक व्यक्ति ने अभी हाल ही में भावावेश में आकर अपनी पत्नी की हत्या की है, पर जब वह अपनी पत्नी का स्मरण कर रहा है, तो जान पड़ता है कि उसके साथ उसका सम्बन्ध बहुत ही असाधारण और अद्भुत था, और उस स्मरण में पत्नी की बहुत ही आत्मीय स्मृतियाँ उभरती हैं। पूरी कहानी पढ़ने के दौरान इस बात का निर्धारण बहुत मुश्किल हो जाता है कि इस व्यक्ति की चेतना के किस अंश को अपराधी माना जाय और किस अंश को निर्दोष माना जाय। विधि व्यक्ति को एक समग्र अखण्डित इकाई के रूप में देखना चाहती है, जोकि उसको दण्डित करने के लिए ज़रूरी है। पर साहित्य मनुष्य की परिभाषा को ही इतना समस्यामूलक बना देता है या उसमें विखण्डन पैदा कर उसको इतने सारे तत्त्वों के रूप में पेश कर देता है कि उसको फैसले और दण्ड का विषय बना पाना मुश्किल होता है। व्यक्ति के अलग-अलग बिखरे हुए अंशों को साहित्य एक समग्र इकाई में परिभाषित नहीं करना चाहता क्योंकि वह अपने स्वभाव से ही सामान्यीकरण के ख़िलाफ़ होता है। ऐसे में साहित्य का विमर्श ‘आतंकवाद’ की परिघटना की समझ को विकसित करने में प्रासंगिक कैसे हो सकता है?

मदन: साहित्य कभी भी ‘आतंकवाद’ का निर्धारण करने या उसको परिभाषित करने का काम नहीं करेगा। वह कोई अदालत नहीं है, कोई नैतिक संहिता नहीं है, जहाँ पर ‘आतंकवादी’ को या किसी को भी दण्डित किया जाना है। जैसा कि हम शुरू में कह रहे थे, आप ‘आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल करते ही उसको परिभाषित करते हैं, जोकि अपने आप में एक तरह की हिंसा है। तो ये कोशिशें अपने आप में उन कारकों में शामिल हैं जो ‘आतंकवाद’ को जन्म देते हैं। ये भी विमर्श के क्षेत्र में ‘आतंकवादी’ कार्रवाइयाँ हैं। क्योंकि जैसे ही आप परिभाषित करते हैं, आप परिसीमित भी करते हैं; जैसे ही आप एक नाम देते हैं, वैसे ही आप उन सारी सम्भावनाओं को ख़त्म कर देते हैं या उस एक नाम में सिमटा देते हैं जोकि किन्हीं अन्य नामों से पुकारी जा सकती थीं। एक पहचान को स्थिर करते हुए आप बहुत सारी पहचानों का अपवर्जन करते हैं, या उनको हाषिये पर धकेल देते हैं। और इस तरह आप उस असन्तोष को जन्म देते हैं जोकि अपने विकृत रूप में पहचान के ‘काउण्टर-एसर्सन’ में बदलता है। साहित्येतर विमर्शों की समस्या यही है। साहित्य इसीलिए कभी ‘आतंकवाद’ को परिभाषित करने, उसका निर्धारण करने, की कोशिश नहीं करेगा। वह शायद एक ऐसे संश्लिष्ट मनुष्य को चरितार्थ करने की कोशिश करेगा जो एक साथ ‘आतंकी’, भी है और ‘आतंकवाद’ का शिकार भी है, पीड़ा पहुँचाने वाला भी है और पीड़ित भी। इसीके साथ-साथ वह उस संघटना को ख़ुद हमारे भीतर लोकेट करने की कोशिश करेगा। वह कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति को सामने नहीं लाएगा जिसकी ओर कृति का सेल्फ़ अँगुली उठाकर उसको ‘आतंकवादी’ कह सके। साहित्य की अँगुली हमेशा अपनी ओर उठेगी। वह एक ऐसी स्थिति पैदा करेगा जिसमें कि आप अपने को उस जगह खड़ा पाएँ जिस ओर आपकी अँगुली उठी हुई है; जिस जगह खड़े होकर किसी व्यक्ति ने बम का धमाका किया है। उस जगह जहाँ शिकार और शिकारी एक-दूसरे के सन्दर्भ में शब्द और अर्थ की तरह एक दूसरे से गुँथे हों। साहित्य इनके सा-हित्य को चरितार्थ करेगा। साहित्य आपको उस जगह खड़ा करेगा जहाँ पर इस विस्फोटक व्यक्ति को तैयार किया था। ‘आतंकवाद’ के कारण और कार्य के संश्लेषण को किसी चरित्र, या किसी मानवीय स्थिति में रूपायित करना और इससे भी अधिक इस समूची संघटना को एक अस्तित्वपरक संकट के रूप में सामने लाने की कोशिश करना, सब तरह के जोखिम उठाते हुए-साहित्य की भूमिका, इस सन्दर्भ में, शायद कुछ इस तरह की होगी। जब तक हम एक ऐसे स्वत्व को सामने नहीं लाते हैं जिसके भीतर यह सब एक साथ घटित हो रहा है तब तक हम इस जटिल संघटना को नहीं समझ सकते। इस संश्लेषण में साहित्य किसी दैवी कर्ता की तरह सफल नहीं भी होगा, तो वह अकुण्ठ भाव से अपनी विफलता को भी दिखायेगा।

दीपेन्द्र: मेरा आशय यह था कि विधि के लिए क्योंकि अपराध और दण्ड का एक विमर्श विकसित करना है, इसलिए उसके लिए अपने होने में ही स्पष्ट समझ, स्पष्ट परिभाषाएँ, स्पष्ट नामकरण अनिवार्य है, अन्यथा वह विधि नहीं हो सकती। जबकि साहित्य समझ के विरोधाभास या समझों की असंगति पैदा कर, बल्कि समझ की पर्याप्तता को ही प्रश्नांकित कर, समझदारी को ही अधूरा मानकर उसे गैरज़रूरी बना देता है। वह हर मुकाम पर समझ को अपर्याप्त और अधूरी मानकर चलता है। तो ऐसे में संसार ‘आतंकवाद’ के समाधान की अपेक्षा साहित्य से कैसे कर सकता है?

मदन: देखिये, अव्वल तो संसार साहित्य से कोई अपेक्षा नहीं कर रहा है। संसार अगर सबसे कम किसी से अपेक्षा करता है, तो वह साहित्य है…

दीपेन्द्र: शायद इसलिए कि संसार साहित्य-निरपेक्ष है…

मदन: शायद…। और संसार साहित्य से कोई अपेक्षा न करे, यह समझ संसार में पैदा करने का काम शायद साहित्य ने ही किया है। अपने प्रभाव में साहित्य एक फलप्रद विमर्श नहीं है। साहित्य का उद्देश्य समाधान देना नहीं है। साहित्य का शायद कोई उद्देश्य नहीं है, लेकिन समाधान देना तो कतई नहीं है। समाधान देने के उद्देश्य से समाज में बहुत सी संस्थाएँ-विद्याएँ मौजूद हैं। बेहतर क़ानून-व्यवस्था या फलाँ क़ानून को पुनर्जीवित करना या एक नया क़ानून बनाना…। ये कोशिशें कितनी दयनीय हैं, इसे हम विधि के इतिहास से समझ सकते हैं। मैं नहीं समझता कि विधि इतनी चाकचौबन्द पुराने ज़मानों में रही होगी, जितनी कि वह आज है। इलेक्ट्रॉनिक क़िलेबन्दी से लैस अमेरिका में ९/११ का घटित होना यह बताता है कि समाधान के वो रास्ते जिनपर हमारा समाज चलने को विवश है, कितने दयनीय और निरुपाय हैं। फिर भी समाधान देने का उनका जज़्बा बरकरार रहता है। और इस जज़्बे में विश्वास करने वालों में साहित्यकार भी शामिल हो सकते हैं। मसलन एक लेखक अपने उपन्यास में वो सारी चीज़ें कर रहा हो सकता है जिनकी बात हम कर रहे हैं, जिनके बारे में हमें लगता है कि अपने आदर्श रूप में साहित्य ऐसा करता है, पर वही उपन्यासकार समाज के उन सुरक्षा उपायों में विश्वास कर सकता है, जिनकी विफलता की बात हम कर रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि विधि की ज़रूरत नहीं है। विधि की ज़रूरत किसी उपन्यास के चरितनायक या उपन्यास के आत्म के लिए न हो, पर उस उपन्यासकार के लिए तब भी होगी। इसलिए इसमें किसी तरह के पुण्यात्मापन की बात मैं नहीं कर रहा हूँ। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि लेखक तो बहुत पुण्यात्मा है, और वह तो साहित्य की दुनिया में रहता है और उसको विधि से कोई लेनादेना नहीं है…। ऐसा नहीं है। मैं तो उस प्रज्ञा की बात कर रहा हूँ जो एक कृति के माध्यम से हम तक पहुँचती है। वह शायद एक असम्भव प्रज्ञा है; वह एक ऐसी चीज़ है, जिसका शायद कोई अनुप्रयोग सम्भव नहीं है। वह हमेशा गल्प के क्षेत्र में है और शायद उसी क्षेत्र में बने रहने के लिए अभिशप्त है। पर गल्प के इस क्षेत्र का अस्तित्व तो है ही। और उसका अस्तित्व सिर्फ़ गल्प में ही नहीं है, बल्कि हमारे भीतर भी उसका अस्तित्व है। तभी इस दुनिया में साहित्य के रचयिता और पाठक होते हैं। उन्हीं के बीच एक संवाद की सम्भावना बनी होती है। क्योंकि गल्प के क्षेत्र में जो कुछ रचा जाता है, जो कुछ रचा जा सकता है, वह इसी उम्मीद से कि मनुष्य के भीतर कोई ऐसा अवकाश है जहाँ पर उसकी प्रतिश्रुति सुनी जा सकेगी। और वह मनुष्य जो एक लौकिक प्राणी होने के नाते, सामाजिक प्राणी, या एक नागरिक होने के नाते समाज के नियमों का पालन कर रहा है, उनसे तरह-तरह की अपेक्षाएँ कर रहा है, उनमें भागीदारी कर रहा है, उस मनुष्य के भीतर भी एक गुंजाइश ऐसी है जहाँ पर वह इन सबकी निरुपायता को समझ सकता है, और जिस अवकाश में स्थित होकर वह समझ सकता है कि इस समस्या का असल रूप क्या है।

दीपेन्द्र: ‘आतंकवाद’, एक तरह से, न्यूनतम रूप से, एक ‘सामुदायिक पहचान’ पर टिका हुआ लगता है, और यह सामुदायिक स्वत्व या तो अन्यत्व का अभिशाप झेल रहा है या किसी अन्य पहचान की प्रतिस्पर्धा में है। सामुदायिक पहचानों का यह संघर्ष ‘व्यक्ति’ की अपनी गहरी असुरक्षा का संकेतन करता लगता है; ‘व्यक्ति’ अपने भीतर इतना असुरक्षित महसूस कर रहा है कि ‘सामुदायिक पहचान’ में ही वह अपनी सुरक्षा महसूस कर रहा है; बल्कि उसका निर्माण वह अपनी आस्था से कर रहा है। पर जैसे दार्शनिक देरीदा अपनी पहचान बतलाते हैं कि मैं थोड़ा अरब हूँ, थोड़ा यहूदी हूँ, थोड़ा ब्लैक हूँ…आदि, तो अगर ऐसी बहुत सारी पहचानों के संश्लेषण को हर व्यक्ति स्वीकार कर ले, तो पहचानों के संघर्ष की स्थिति शायद न बने। राष्ट्र्र-राज्य पहचानों की सुनिश्चित इकाई पर टिका हुआ है, या वह पहचानों के संश्लेष का अपवर्जन करता है। साहित्य में पहचानों के संष्लेषण की सम्भावना इसलिए दिखलायी देती है क्योंकि वह मनुष्य की चेतना तक पहुँचने का प्रयास करता है, और उसकी पहचान की गढ़न की प्रक्रियाओं में गहरे उतरने की कोशिश करता है।

मदन: बल्कि वह शायद एक ऐसा रूप है जो पहचान के आग्रह के अपरिग्रह से सम्भव होता है। वह कई सारी पहचानों का संष्लेषण नहीं है बल्कि एक ऐसी इकाई है जोकि आपको पहचानों के समग्र के रूप में ‘दिखायी देती है’, क्योंकि आप उसमें विखण्डन पैदा करके उसको बहु-पहचान-मूलक शक्ल दे देते हैं।

जहाँ तक ‘आतंकवादियों’ द्वारा एक व्यक्ति के रूप में अपनी पहचान के संकट से उबरने के लिए सामुदायिक पहचानों के वरण की आपकी बात है, तो हम नहीं जानते कि सैकड़ों ‘आतंकवादी’ कार्रवाइयों में मारे गये ‘आतंकवादी’ वाकई वैयक्तिक पहचान के किसी संकट का सामना कर रहे थे। इसी के साथ, अगर वह सामुदायिक पहचान है भी, तो उसके पीछे एक गहरी धार्मिक आस्था भी अक्सर दिखायी देती है, ख़ासतौर से उसमें जिसे हम मानव-बम कहते हैं। मानो वह ईश्वर के आदेश पर, या किसी दैवीय अनिवार्यता का निर्वाह करते हुए की गयी आत्मोत्सर्ग की कार्रवाई हो। धर्म की इन ‘आतंकवादी’ समुदायों की प्रच्छन्न व्याख्या चाहे कितनी ही अप्रमाणिक हो, इन समुदायों की धार्मिक आस्था असन्दिग्ध प्रतीत होती है। और इस धार्मिकता के भीतर ‘व्यक्ति’ या ‘वैयक्तिक पहचान’ शायद ही कोई मूल्य होगा। इसलिए यह एक अटकल ही है, जो आप कह रहे हैं, भले ही एक तार्किक रूप से विश्वासप्रद अटकल।

आपके कहने में यह भी कहीं ध्वनित है कि वैयक्तिक पहचान का यह संकट बड़े पैमाने पर महसूस किया जा रहा है। लेकिन, अगर ऐसा है तो, इस संकट का स्रोत क्या है? वह क्या चीज़ हो सकती है जो किसी समाज के भीतर व्यक्तियों में उनकी व्यक्तिमत्ता की क्षति के रूप में अनुभव की जा रही हो? इसका क्या कारण हो सकता है?

दीपेन्द्र: निजी पहचान तो अर्जित की जाती है, लेकिन यह सामुदायिक पहचान एक तरह से आरोपित की जाती है। और ‘आतंकवादियों’ के सन्दर्भ में यह आरोपण जिस कच्ची उम्र में होता है, उसे देखते हुए उस पहचान को आस्थापूर्वक मान लेना शायद ज़रूरी हो जाता है…।

मदन: पर जो लोग इस कृत्य में मुब्तिला हैं, उनके लिए वैयक्तिक पहचान का क्या वाकई कोई अर्थ है? और वैयक्तिक पहचान की यह धारणा किस की दी हुई है?

दीपेन्द्र: ज़ाहिर है, आधुनिकता की। और वह किसी तरह की सामुदायिक पहचान को नहीं मानती।

मदन: ऐसा कहना शायद आत्मछल होगा कि मुख्यतः जिस अन्य के प्रति उनका यह कृत्य सम्बोधित है, वह स्वयं सामुदायिक पहचान से बाहर है । वहाँ भी सामुदायिक पहचान प्रभावी है। वहाँ भी राष्ट्र्र, राज्य, हम, हम अमेरिकी आदि सब है…।

दीपेन्द्र: बल्कि जो विधि है, उसमें भी दिखता है ये…

मदन: साफ़तौर पर दिखता है। आप ये भी देखें कि ये सब के सब गहरे धार्मिक हैं। भले ही बहुत से पण्डित यह कहते रहें कि उनके धर्म का सम्बन्ध इस तरह की गतिविधियों से नहीं है। वे शायद ठीक भी कहते हों, लेकिन एक ख़ास तरह की धार्मिकता तब भी इन लोगों में मौजूद है। इस धार्मिक जज़्बे के सन्दर्भ में मुझे न सिर्फ वैयक्तिक पहचान के आग्रह की या उसकी क्षति के बोध की कोई गुंजाइश दिखायी नहीं देती, बल्कि इसके विपरीत वैयक्तिक पहचान को प्रतिरोध देने की भावना ज़्यादा दीखती है। और यह शायद स्वाभाविक है क्योंकि वैयक्तिकता का विचार उनकी धार्मिकता के सन्दर्भ में एक प्रतिरोध्य विचार है। इस सिलसिले में आप ओरहान पामुक के उपन्यास माई नेम इज़ रेड के भीतर चलने वाली बहसों को याद कर सकते हैं।…

बहरहाल, ‘आतंकवाद’ की समूची संघटना से व्यक्ति पूरी तरह से ग़ायब है। और साहित्य जो कर सकता है, उसमें शायद यह भी शामिल है कि वह ‘आतंकवाद’ के दोनों ओर फैले राष्ट्र्र, राज्य, सम्प्रदाय, धर्म, विचारधारा आदि के ईंट-गारे से बने सामान्यीकरण और समुदायपरकता के इस दुर्ग में सेंध लगाये और उसके भीतर व्यक्ति को तलाशने-पहचानने की कोशिश करे।

दीपेन्द्र: अभी बेंगलोर में प्रेमी युगलों पर जिस तरह के हमले हुए हैं, उनमें क्या एक तरह से आधुनिकता का अस्वीकार नहीं दिखता, कि अगर हमने इस आधुनिकता को मान लिया तो हमारी संस्कृति ख़त्म हो जाएगी? और इसलिए इन तथाकथित सांस्कृतिक संरक्षणवादियों का आधुनिकता के बरक्स अपनी संस्कृति को बचाने का प्रयास उत्तरआधुनिकता की ओर संकेत नहीं करता? हमारे यहाँ आधुनिकतावाद का सबसे बड़ा एजेण्ट शायद राज्य ही है, पर जो भी हो, आधुनिकता के पचास-साठ बरस गुज़र जाने के बाद, बेंगलोर जैसे मैट्रोपॉलिटन शहर में इस तरह की घटनाओं का होना क्या आधुनिकतावाद के प्रति एक सामुदायिक भय का संकेत नहीं है? और इस मायने में क्या यह भी एक ‘आतंकवाद’ नहीं है?

मदन: देखिये अब तक हम ‘आतंकवाद’ के बारे में जो बातें कर रहे थे, उनमें निहित तर्कों को हमने सीधे-सीधे हिन्दुस्तान में हो रही ‘आतंकवादी’ घटनाओं के सन्दर्भ में देखने की कोशिश नहीं की है। हमारा सामान्य परिप्रेक्ष्य वैश्विक रहा है। उसमें भी ईसाइयत या/और आधुनिकता बनाम इस्लाम के सन्दर्भ में ही हमने इसको समझने की कोशिश की है। इसलिए हिन्दुस्तान में जो कुछ हो रहा है वह ‘आतंकवाद’ के इस वैश्विक रूप से संगत नहीं लगता, सिवा इसके कि अमेरिका के साथ भारत के मधुर सम्बन्ध उसके लक्ष्य पर हों, जैसा कि पाकिस्तान के सन्दर्भ में भी है। क्योंकि, जैसा कि हमने शुरू में कहा, उनकी कार्रवाइयाँ सांकेतिक हैं; वे एक सभ्यता पर, एक विचारदृष्टि पर आघात करने की कोशिशें हैं। हालाँकि इसमें यह अन्धापन है कि इस कोशिश में वे मनुष्यों की नृशंस हत्याएँ करते हैं। अन्यथा मैं नहीं समझता कि हिन्दुस्तान इस्लाम का उस तरह का प्रतिपक्ष है, जैसा कि अपने धार्मिक संस्कारों और साभ्यतिक आदर्शों में पश्चिम है। इसलिए यहाँ की ‘आतंकवादी’ घटनाएँ अलग व्याख्या की माँग करती हैं।

जहाँ तक बेंगलोर की घटनाओं का सवाल है, उनमें हिंसा तो है ही। ‘आतंकवाद’ वह उस अर्थ में नहीं है, लेकिन उसके भीतर सूक्ष्म रूप में वही संवेग हैं जो ‘आतंकवाद’ के संगठित रूप को जन्म देते हैं। एक ख़याल अपनी संस्कृति और धर्म का, उसकी रक्षा का, उसका रक्षक होने का…। यह संकट- पहचान का यह संकट -एक सामी संस्कृति के भीतर तो समझ में आने वाली बात लगती है, जहाँ पहचान एक संगठित धर्म के भीतर, और संगठित धर्म के द्वारा वैधीकृत होती है। लेकिन जिसे आप हिन्दू धर्म कहते हैं, हिन्दू संस्कृति कहते हैं, उसमें पहचान का वैसा संस्थानपरक आग्रह नहीं है…। इसलिए हिन्दुस्तान के सन्दर्भ में इस तरह के सांस्कृतिक भय को इस्लामी कट्टरपन्थियों के भय के समतुल्य देखना मुझे ठीक प्रतीत नहीं होता। क्योंकि इस्लामी कट्टरपन्थियों का सांस्कृतिक भय उनकी प्रतिरूप संस्कृति के सन्दर्भ में खरा प्रतीत होता है- उस भय से हमारी चाहे कितनी ही असहमति क्यों न हो और वह भय चाहे कितना ही निवारणीय क्यों न हो। उन्होंने उसकी क़ीमत भी चुकायी है-सिर्फ़ उस विनाश के अर्थ में नहीं जो ‘आतंकवाद’ के कारण उनका समाज भोग रहा है, बल्कि साभ्यतिक अर्थ में। आधुनिकता के अपरिग्रह के अर्थ में। एक ख़ास तरह का प्रतिरोध जो उन्होंने आधुनिक मूल्यों और आधुनिक असबाब को, कमॉडिटीज़ को, कुल मिलाकर आधुनिकतावाद के अनिष्ट को दिया है, उसके नतीजे में जो क़ीमत उन्होंने चुकायी है, वह बहुत बड़ी क़ीमत है।

दीपेन्द्र: हम बात कर रहे थे कि साहित्य का विमर्श हमेशा ही अव्यवहारिक होगा और इस नाते अप्रासंगिक भी होगा। लेकिन क्या अपनी इसी अव्यवहारिकता के नाते वह एक ऐसा बिन्दुपथ तैयार नहीं करता जिससे इस संसार की सूक्ष्म बुनावटों में अन्तर्निहित आतंक के मर्म तक वह हमें ले जाता है?

मदन: यह साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण कि वह जो भी संरचना गढ़ता है, या जो भी संरचना उसकी उभरती है, उसको निर्मित करने के क्षण में ही वह उसको तोड़ता भी है। वह उसको किसी भी तरह से अभेद्य और हमेशा के लिए संहत हो जाने वाला रूप नहीं लेने देता। वह हमेशा बनने के साथ-साथ मिटने की प्रक्रिया में होता है। यह चीज़ अस्तित्व के प्रति उसके दृष्टिकोण में भी प्रगट होती है, जहाँ वह उसके बनने की प्रक्रिया में निहित विघटन और विघटन की प्रक्रिया में निहित गठन को लक्ष्य करता है। और इसीलिए वह उसके उन सारे तत्त्वों को पकड़ने की कोशिश करेगा है, जिनमें से एक चीज़ वह भी कही जा सकती है जिसका संहत या अवधारणात्मक रूप ‘आतंकवाद’ है। वह चीज़ मानवीय अस्तित्व के भीतर ही कहीं है, और क्रियाशील है-साहित्य इसकी ओर निगाह डालने की कोशिश करेगा। आप जिस पहचान के संकट की बात कर रहे थे, उसके सन्दर्भ में कहें, तो वह पहचान की लालसा और उसमें निहित हताशा दोनों को एक ही मानव इकाई के भीतर समझने की कोशिश करेगा; एक ही वक़्त में नाम देने, परिभाषित करने या परिभाषित होने की कोशिश और परिभाषा में निहित पहचानहीनता या पहचान के लोप को पकड़ने की कोशिश।

दीपेन्द्र: आपकी इस बात से मुझे नाबाकोव का वह कथन याद आता है जिसमें वे कहते हैं कि उपन्यास का सौन्दर्य दरअसल कॉमनसेंस की सिटी (City) को ब्लास्ट करने में पैदा होता है। थोड़ा-सा और ध्यान से देखें तो उपन्यास के अपने सौन्दर्य के लिए ‘काउण्टरप्वाइण्ट’ की अनिवार्यता है; उसके लिए उसका पॉलीफोनिक होना बहुत ज़रूरी है। तो एक तरह से उपन्यास उसके भीतर स्थित प्रतिवादी पक्ष से निरन्तर संवाद या असंवाद करते हुए, और लगातार अपने होने को प्रश्नांकित करते हुए विस्तार पाता है। और इसलिए वह किसी सामान्यीकरण की परिधि में नहीं आता। तो क्या इस नाते यह नहीं लगता कि उपन्यास की बुनावट चूँकि ऐसी है इसलिए वो सबसे ज़्यादा आत्मीयता से ‘आतंकवाद’ की संश्लिष्टता को अपने ढाँचे में ग्रहीत कर सकता है?

मदन: हाँ। इसी बात को थोड़े और रोचक ढंग से कहें तो वह ‘आतंकवाद’ के सन्दर्भ में स्वयं एक ‘आतंकवादी’ कार्रवाई की तरह हो सकता है। और वह कार्रवाई अवबोध और अभिव्यक्ति दोनों स्तरों पर हो सकती है। ‘आतंकवाद’ का साहित्येतर, प्रचलित विमर्श एक ‘कॉमनसेंसिकल’ विमर्श ही है; ‘आतंकवाद’ के ‘कॉमनसेंस’ का शहर। और अगर उसके सन्दर्भ में उपन्यास की किसी सम्भावना की कल्पना करें तो वह इस नगर में एक विस्फोट पैदा करने की कोशिश करेगा। यह विस्फोट दो स्तरों पर हो सकता हैः एक, वह ‘आतंकवाद’ के इस ‘कॉमनसेंसिकल’ विमर्श के चिथड़े उड़ा दे, पर, दूसरे, वह आत्मघाती कार्रवाई के रूप में भी हो सकता है; मतलब, वह ‘कॉमनसेंस’ के इस स्थल पर अपने शरीर पर ही विस्फोटक बाँधकर जा सकता है, और इस तरह वह अपने भी चिथड़े उड़ा सकता है, जैसा कि खाली जगह उपन्यास करता है। हालाँकि ‘कॉमनसेंस’ का एक निश्चित इलाका है जहाँ पर यह उपन्यास घटित होता है; वह इलाका जहाँ पर हम ‘आतंकवाद’ के प्रभाव को लक्षित करते हैं। बहरहाल वह इस इलाके में आत्मघाती विस्फोट करता है, और जितने चिथड़े उस ‘कॉमनसेंस’ के उड़ाता है, उतने ही चिथड़े अपने भी उड़ाता है। इसी में उपन्यास की मार्मिकता है। मुझे लगता है कि साहित्य की वैधता इसी में है। साहित्य की मीमांसा महज़ एक वस्तुपरक मीमांसा नहीं है, वह हमेशा ही, अपनी मीमांसा भी है। और मुझे लगता है कि ‘आतंकवाद’ का अगर कोई समाधान हो सकता है, तो वह इसी बात में हो सकता है कि जिन लोगों के खिलाफ़ ‘आतंकवाद’ है, उनके भीतर आत्मालोचना भी विकसित हो। आप अपनी अवधारणाओं, विश्वासों, मतों, आग्रहों और अपनी संस्थाओं के भीतर अगर आत्मालोचना का एक अनिवार्य अवकाश बनाकर रखते हैं, जैसा कि साहित्य करता है, तो ये चीज़ें निरन्तर अपने संघटन और विघटन की प्रक्रिया में होंगी और तब शायद इसकी उत्प्रेरणा नहीं होगी कि दूसरा आये और उनको तोड़े।

दीपेन्द्र: यहाँ मुझे एक दूसरा उपन्यास याद आता है, मार्क़्वेज़ का ऑटम ऑफ् दि पेट्रियार्क। उपन्यास में एक ऐसा सैनिक तानाशाह है जिसने सैकड़ों बर्बर हत्याएँ की हैं, दमन का भयावह वातावरण बनाया है और इसी वातावरण के निर्माण में वह अपने अस्तित्व की सार्थकता देख रहा है। बल्कि वह जितना दमन कर रहा है उतना ही उसे एक तरह का सुकून मिल रहा है। पर मार्क़्वेज़ ने इस उपन्यास में समूची वाक्यरचना को ही बदल दिया है। यही नहीं, बल्कि समय के संघटन को, जोकि चेतना में अन्तर्निहित होता है, भंग करते हुए, उसके सारे व्यवहार, सारे क्रियाकलापों को इतनी आत्मीयता से देखा है कि पितृसत्ता को आरोपित करने वाले इस सैनिक तानाशाह की चेतना के अन्तर्निहित विचलन बहुत ही मर्मस्पर्शी ढंग से उभरते हैं। यहाँ पर उपन्यास अपने कथ्य में प्रयोग कर रहा है और ऐसे असम्भव को कहने का प्रयास कर रहा है जिसकी गुत्थी या रहस्य स्वयं चेतना में उलझा हुआ है। चेतना के इस उलझाव के साथ-साथ वह हमें शक्ति की अभेद्य संरचना तक भी ले जाने की कोशिश करता है।

मदन: यानि एक क़िलेबन्दी है, तानाशाही की, जिसको भेदने की कोशिश उपन्यास कर रहा है। एक तानाशाह या अत्याचारी चेतना के सन्दर्भ में हमारा ‘कॉमनसेंसिकल’ विमर्श क्या करेगा? वह उसका एक प्रतिपक्ष गढ़ेगा; एक ऐसी चेतना की कल्पना करेगा जोकि इस तानाशाह चेतना की शिकार है। लेकिन मार्क़्वेज़ उसी तानाशाह चेतना में सेंध लगाने की कोशिश करते हैं। आप कह सकते हैं कि एक तरह का विस्फोट वह भी है। आप कह रहे हैं कि मार्क़्वेज़ ने इस उपन्यास में कथ्य के स्तर पर प्रयोग किया है। लेकिन मैंने जब इस उपन्यास को पढ़ने की कोशिश की थी, तो मुझे वह काफी दुरूह लगा था; उपन्यास की वाक्य-रचना मुझे बहुत जटिल प्रतीत हुई थी। मुझे लगता है कि इस तरह उपन्यास वाक्य-रचनापरक सरलता को भंग करता है, और हमारी चेतना की ‘कॉमनसेंसिकल’ वाक्य-रचना की अभ्यस्ति में दरार पैदा करता है, उसकी ‘कण्डीशनिंग’ को तोड़ता है। साहित्य दोहरे स्तर पर काम करता है। उपन्यास में जो कुछ घटित हो रहा है, वो अपनी जगह पर तो हो ही रहा है, लेकिन उसके लक्ष्य के सिरे पर, यानी पाठक के मानस में, भी वह एक दूसरे स्तर पर घटित हो रहा है। पर ऐसा वह उद्देश्यपरक ढंग से नहीं कर रहा है, बल्कि अपने विशिष्ट कथ्य के निर्वचन की प्रक्रिया में वह इसी तरह आकार ले सकता था कि उसका एक सह-प्रभाव उसके पाठक पर भी पड़े कि उसका भाषिक ‘कॉमनसेंस’ टूटे। और इसी अर्थ में वह एक ऐसा आघात है जो साथ ही साथ आत्माघात भी है। उपन्यास का स्वत्व हमेशा पाठक के स्वत्व में ही चरितार्थ होता है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि पाठक की चेतना पर यह उपन्यास कुछ इस तरह घटित होगा कि वह उसके भाषिक ‘कॉमनसेंस’ को भी वह तोड़ेगा और इस प्रक्रिया में वह उस पाठक के भीतर वैसा तानाशाह हो सकने की सम्भावना को भी स्वयं उस पाठक के लिए सामने लाएगा। क्योंकि किसी भी तरह की तानाशाही की दिशा में आपको अन्ततः तरह-तरह के कॉमनसेंस ही ले जाते हैं। संसार के बारे में एक तानाशाह का बोध ‘कॉमनसेंसिकल’ ही होता है; वह संसार की विशिष्टता को नहीं समझता। वह संसार की ‘कॉमनसेंसिकल’ व्याख्या करते हुए, उसको ‘कॉमनसेंस’ के स्तर पर ग्रहण करते हुए ही अपनी विशिष्टता को एक अत्याचारी विशिष्टता में बदलता है।

दीपेन्द्र: ‘आतंकवाद’ का अर्थ एक ध्वंसात्मक कार्रवाई के रूप में स्थापित है: व्यवस्था का, उसको वैध ठहराने वाले नागरिकों का, और सार्वजनिक सम्पत्ति का ध्वंस करना। लेकिन ‘आतंकवाद’ का एक निहितार्थ यह भी लगता है कि वह एक तरह का सन्नाटा या एक तरह की भाषाहीनता स्थापित करना चाहता है, जिसमें ‘आतंकवादी’ के अर्थ की एकवाच्यता स्थापित हो सके। दरअसल उसका आघात चेतना पर ही है। इस नाते ‘आतंकवाद’ उस भाषा पर भी हमला है, जिसका एक काम संसार में सम्बन्धों की स्थापना और उनको बनाये रखना भी है। इसके बरक्स उपन्यास है, जो दरअसल अपने रूप में ही भाषा की साधना करता है, मानवीय सम्बन्धों या उनमें पैदा हो रही दरारों की समझ विकसित करता है….

मदन: हम लोग उपन्यास पर ही इतना ज़ोर क्यों दे रहे हैं? क्या हम उपन्यास की जगह साहित्य-मात्र की बात इसलिए नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उपन्यास में ही इस चीज़ की अधिक गुंजाइश है? खैर।

सन्नाटा पैदा करने वाली आपकी अटकल के सन्दर्भ में मुझे लगता है कि जहाँ तक उनकी कार्रवाई के प्रभाव का सवाल है, वहाँ तक आपकी बात सही हो सकती है। लेकिन यह प्रभाव पैदा करना उनका ध्येय है, ऐसा शायद नहीं है। अगर इस प्रभाव का उन्हें अहसास हो, तो हो सकता है, इसे वे अपने ध्येय में शायद शामिल भी करलें, लेकिन यह उनकी एक बौद्धिक युक्ति है, जैसा कि आपकी बात से निकलता है, इसमें मुझे सन्देह है। यह सही है कि एक विस्फोट होता है और वह एक स्तब्धता पैदा करता है। और उस स्तब्धता में जो भी आवाज़ें हैं वे बिला जाती हैं और आपका ध्यान पूरी तरह से उस आवाज़ पर जाता है जोकि दरअसल सुनायी नहीं देती। यानी वे अपनी खामोशी को श्रव्य बनाते हैं। क्योंकि वहाँ शायद कोई भाषा नहीं है। और यही उसके सन्दर्भ में शायद हमारी हताशा है। अगर भाषा हो तो आप उससे निबट सकते हैं; क्योंकि तब आप उसका अर्थ कर सकते हैं, उसके आधार पर कोई संवाद स्थापित कर सकते हैं। पर वहाँ एक खामोशी है, कम से कम अभिव्यक्ति के स्तर पर। आप कह सकते हैं कि ‘आतंकवादी’ संगठनों की ओर से आता हुआ सन्देश अपने आपको इस खामोशी की शक्ल में पेश कर रहा है। आप यह नहीं जानते हैं कि दरअसल वे क्या कहना चाह रहे है। हमें भ्रम होता है कि वह एक अर्थगर्भी खामोशी है और हम उसके बारे में अटकलें लगाते हैं। एक तरह का रहस्य, और इस रहस्य में एक तरह की दैवीयता भी है। इस वक़्त दुनिया में सक्रिय ‘आतंकवादियों’ में शायद ही कोई ऐसा है जो अपने सन्देश के स्रोत को लोकातीत न मानता हो।

खैर, अगर ऐसा है, यानी अगर वह एक रहस्यमय खामोशी है, अगर उसमें अर्थ और अर्थहीनता का द्वैध है, तो इस द्वैध के सन्दर्भ में साहित्य क्या कर सकता है? वह इस द्वैध के प्रति किस तरह प्रतिश्रुत होगा? व्यवस्था इस पर कान नहीं देना चाहती। वह मानती है कि इस खामोशी का एकमात्र उद्देश्य आतंक पैदा करना है, जोकि कोई भी खामोशी या, गीतांजलि के रूपक के सहारे कहें तो, कोई भी ‘खाली जगह’, पैदा करती है। साहित्य, मुझे लगता है, इस द्वैध खामोशी को ही सुनने, उसको प्रतिध्वनित करने की कोशिश है। दो तरह से: बम की भीषण अर्थहीन ध्वनि से उत्पन्न इस खामोशी का भाषिक ‘काउण्टरप्वाइण्ट’ रचते हुए; अपने भीतर की अर्थपूर्ण द्वैध खामोशी (जोकि साहित्य के भीतर हमेशा ही होती है) को उसके बरक्स रखते हुए; और, दूसरे, जोकि पहले से भिन्न शायद नहीं है, उस खामोशी को अपना विषय बनाकर, उसको एक अर्थपूर्ण मौन में बदलते हुए, उसमें अर्थ की उत्प्रेक्षाएँ करते हुए। और ऐसा करते हुए वह उस चेतना को उद्दीप्त और जाग्रत करने की कोशिश करेगा जिसने सम्भवतः उसमें कोई अर्थ पैदा करना ही नहीं चाहा था। साहित्य उस रहस्य को भंग नहीं करेगा, लेकिन अपनी उत्प्रेक्षाओं के सहारे वह उसको अर्थबहुल बनाने की कोशिश करेगा।

यह बातचीत प्रतिलिपि पर कुछ समय प्रकाशित हो चुकी है, इस लेख के अलावा अन्‍य महत्‍वपूर्ण चर्चाओं, विमर्शों के लिए इस पत्रिका को देखा जा सकता है। प्रतिलिपि पर जाने के लिए यहां क्लिक करें।

Sunday, November 14, 2010

आतंकवाद पर विमर्श - एक

'हमारी सभ्यता उत्तरोत्तर एक अपाठक सभ्यता होती जा रही है'


मित्र संवाद हिन्‍दी का नया मुहावरा नहीं है। यह हिन्‍दी के दो मुर्धन्‍य साहित्‍यकारों-

रामविलास शर्मा और केदार नाथ अग्रवाल के बीच संवाद से हिन्‍दी को मिला है।

साहित्‍य, पत्रकारिता के क्षेत्र में न केवल इन विषयों के अंदरूनी पेंचों पर बल्कि समकालीन समस्‍याओं और मुददों पर गहन गंभीर चर्चाएं संवाद के जरिए होती रही हैं। प्रस्‍तुत है गीतांजलिश्री के उपन्‍यास 'खाली जगह' के बहाने हमारे समय की सबसे बड़ी समस्‍या आतंकवाद पर दो मित्रों के बीच संवाद की पहली किस्‍त। दीपेन्‍द्र सिंह बघेल और मदन सोनी जी भोपाल में रहते हैं और सामाजिक, सांस्‍क़तिक सरोकारों के लिए जाने जाते हैं।


दीपेन्द्र बघेल: जैसा कि आप जानते हैं, गिरिराज किराडू का आग्रह है कि हम आतंक पर केन्द्रित प्रतिलिपि के अंक के लिए गीतांजलि श्री के उपन्यास खाली जगह पर बातचीत करें। सो वह तो हमें करनी ही है, लेकिन मसला चूँकि आतंक का है, और स्वयं इस उपन्यास में चूँकि इस संघटना (आतंक) का एक महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ मौजूद है, मुझे लगता है कि हम इस उपन्यास पर बात करने से पहले इस संघटना पर भी थोड़ी बात करें। और इस पर भी कि हमारे वक़्त के इस भयावह अनुभव के प्रति साहित्य की प्रतिश्रुति का क्या रूप हो सकता है। यह इसलिए भी ज़रूरी है कि इसके प्रतिरोध में जो विमर्श (Discourse) बन रहा है, वह ज़्यादातर एक सूचनात्मक विमर्श है जिसमें मृत्यु एक आँकड़ा है और जीवन सुरक्षा की एक रणनीति। इस विमर्श में आतंक के अर्थ का न्यूनीकरण होता है और उसके सघन और गहरे अनुभव का दमन होता है। स्वयं ‘आतंक’ शब्द की व्यंजनाओं की हत्या इस विमर्श में होती है। आतंक मनुष्य के शाश्वत अनुभवों में शामिल है, और साहित्य इस अनुभव को, इसके बहुतेरे आशयों में, बहुतेरे कोणों से देखकर, विशिष्ट रूपों में प्रस्तुत करता रहा है। ‘आतंकवाद’ पर साहित्य की प्रतिश्रुति की सम्भावनाओं पर बात करना, इसीलिए इस संघटना पर केन्द्रित विमर्श में एक अधिक मानवीय और प्रामाणिक स्वर को शामिल करना होगा। और इस उपन्यास पर बातचीत के लिए एक संगत पृष्ठभूमि भी हमें इससे मिल सकेगी।

मदन सोनी: मैं सहमत हूँ।

दीपेन्द्र: तो किस तरह देखते हैं आप ‘आतंकवाद’ की इस संघटना को?

मदन: सबसे पहले हमें थोड़ी सतर्कता इस शब्द (‘आतंकवाद’) के प्रयोग को लेकर बरतनी ज़रूरी है। अभी आपने ‘आतंकवाद’-विरोधी विमर्श के सरलीकरणों की बात कही थी, पर क्या आपको नहीं लगता कि इस शब्द को बगैर किसी ऊहापोह के स्वीकार करते ही हम स्वयं इस रिडक्टिव विमर्श में, बल्कि एक तरह के ‘आतंकवादी’ विमर्श में, शामिल हो रहे होंगे? एक आतंक विमर्श का भी होता है जो तब प्रगट होता है जब हम अपने प्रतिपक्षी को, उसके मत की परवाह किये बगैर, अपने अनुभव, अपनी समझ, अपनी कसौटियों के आधार पर परिभाषित करते हैं और उस पर बलात एक नाम आरोपित करते हैं; जब हम उसकी पहचान के साथ हिंसा करते हैं। वे प्रजातन्त्र में विश्वास नहीं करते, पर उनकी कार्रवाईयों का यह इकतरफ़ा नामकरण करते हुए हम भी क्या प्रजातन्त्र में अपनी आस्था का परिचय देते हैं? इसलिए मेरा आग्रह है कि इस बातचीत में हम जब भी ‘आतंकवाद’ और ‘आतंकवादी’ शब्दों का प्रयोग करें, उन्हें अवतरण-चिह्नों के अन्तर्गत रखते हुए ही ऐसा करें। मैं ध्यान दिलाऊँ कि यह अकारण नहीं है कि इस उपन्यास में, बावजूद इसके कि वह जिस घटना के इर्दगिर्द बुना गया है वह एक भीषण बम-विस्फोट की घटना है, कहीं भी ‘आतंकवाद’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है।

‘आतंकवाद’ हमारे भूमण्डलीकृत संसार की संघटना है; वह भूमण्डलीकरण का सहउत्पाद है। भय, जिसका चरम, सघन और अविरत रूप आतंक में प्रगट होता है, इस भूमण्डलीकृत संसार में एक बेहद शक्तिशाली और कारगर अस्त्र के रूप में उभरा है। अपने मत, अपनी विचारधारा, अपने टेरिटोरियल और आर्थिक वर्चस्व को कायम करने का वह सबसे कारगर साधन साबित हुआ है। वह एक तरह से युद्ध के पारम्परिक साधन के विकल्प के रूप में उभरता लगता है। ज़ाहिर है कि यह एक अत्यन्त व्यापक संघटना है जिसे सिर्फ़ उस चीज़ तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता जिसे ‘आतंकवाद’ कहा जाता है। स्वयं ‘आतंकवाद’ को भी देखने का यह ढंग ठीक नहीं है जिसके अनुसार हम ‘आतंक फैलाने वाले’ और ‘आतंक के ‘शिकार’ की स्पष्ट कोटियाँ गढ़ते हैं। दरअसल आतंक की गिरफ्त में दोनों ही हैं। जो ‘आतंकवादी’ हैं वे भी ‘आतंकवाद’ के शिकार हैं; वे खुद भी कहीं बहुत गहरे में डरे हुए हैं। उनके मन में अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति, अपने आत्मसम्मान के डूब जाने का, अपने धर्म के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने का, अपने देश या टेरिटॅरी के डूब जाने का आतंक है। उनको लगता है कि इस आतंक से उबर सकने के जो भी साधन हैं, वे या तो अपर्याप्त हैं, या वे उनके हाथ में नहीं हैं…

दीपेन्द्र: अगर हम मानव-निर्मित संस्थाओं और विधि की बुनावट को ध्यान से देखें, तो क्या ये सारी संस्थाएँ भी मात्र अपनी वैधता को कायम रखने के लिए भय का इस्तेमाल नहीं करती हैं?

मदन: बल्कि उसके भी पहले। संस्थाओं के निर्माण की ज़रूरत के मूल में ही शायद वह है। जितनी भी तरह की व्यवस्थाएँ और संस्थाएँ हैं, वे सब किसी न किसी रूप में सुरक्षा की भावना से जुड़ी होती हैं, जिसके मूल में भय ही है। और उस भय का चरम रूप वही है: मृत्यु। हम भौतिक रूप से, नैतिक रूप से, दैविक रूप से मरने से डरते हैं। हम क़ानून भी इसलिए बनाते हैं क्योंकि हमें यह लगता है कि जो संस्था मृत्यु के विरुद्ध हमारी रक्षा कर रही है, अलग-अलग तरह की मृत्युओं के विरुद्ध, खुद इसको मृत्यु से बचाना ज़रूरी है। विधि की मुख्य भूमिका यही है। इस तरह आप यूँ कह सकते हैं कि पूरी की पूरी व्यवस्था भयमूलक है।

दीपेन्द्र: भय में आत्मसंरक्षण और आत्मसुरक्षा का भाव तो है, पर भावावेश की स्थितियों में उसमें एक तरह की यथार्थनिरपेक्षता भी दिखती है। कई बार वह यथार्थ से स्वायत्त भी होता है और काल्पनिक संयोजन भी करता है। अगर हम अन्य भावों से भय की तुलना करें, तो भय में कल्पना के निवेश की सबसे ज़्यादा गुंजाइश दीखती है। तो भय और गल्प को अगर हम जोड़कर देखें तो इनका चरम हमें साहित्य में ही देखने मिलता है। क्योंकि भय संसार में तो अयोग्यता है, एक तरह की अनफिटनेस है, लेकिन इसी भय की भावना को हम साहित्य में पूरा गौरव पाते हुए देखते हैं। कई उपन्यासों में भय की अलग-अलग भावावेशी स्थितियों के बहुत ही सूक्ष्म विवरण देखने को मिलते हैं।

मदन: कल्पना के लिए बहुत अधिक गुंजाइश उसमें शायद इसलिए भी होती है क्योंकि उसके पीछे एक अज्ञातकारणता है। जहाँ कारण ज्ञात नहीं है, वहाँ एक बहुत बड़ा शून्य है। और वह शून्य बहुत ही विमोहक होता है। वह आपकी कल्पना को प्रलोभित और उत्प्रेरित करता है। आप उस शून्य को भरने के लिए तरह-तरह के रूपाकार गढ़ते हैं। कहावत है: भय का भूत। हम भयभीत होते हैं और अपने भय का विषय गढ़ लेते हैं। लेकिन यह शायद भय के सन्दर्भ में ही नहीं है, अन्य भावों के सन्दर्भ में भी है। जैसे रति का अनुभव भी कल्पना को उत्प्रेरित करता है। उसके इर्दगिर्द भी फन्तासियाँ बुनी जाती हैं। इसी तरह उत्साह का भाव भी तरह तरह की फन्तासियों को उत्प्रेरित करता है। लेकिन यह बात सच है कि भय की इस सन्दर्भ में बहुत बड़ी भूमिका होती है, अपनी उसी अज्ञातकारणता की वजह से।

दीपेन्द्र: ‘आतंकवाद’ में निहित हिंसा के सन्दर्भ में एक प्रश्न यह भी बनता है कि राज्य जो हिंसा करता है, सशस्त्र बलों के माध्यम से, विधि के माध्यम से, उसे वैध माना जाता है; राज्य की बुनावट में ही उसके द्वारा की गयी हिंसा को वैधता दिया जाना शामिल है लेकिन जो राज्य-विरोधी हैं, उनका हिंसा का आचरण अवैध माना जाता है। तो हिंसा की वैधता और अवैधता का यह वर्गीकरण अपने आप में…।

मदन: हिंसा किसी भी रूप में हो, किसी भी पक्ष से हो, वह अन्ततः हिंसा है, और अवांछनीय, निन्दनीय चीज़ है। हर व्यक्ति, बल्कि संसार की हर चीज़ मरणधर्मा है। लेकिन इस सर्वव्यापी मृत्यु का कर्तृत्व किसी के पास नहीं है। उसका कर्तृत्व किसी ऐसे अन्य के हाथ में है जिसके बारे में हम नहीं जानते कि वह कौन है। लेकिन जब आप किसी के जीवन को खत्म करते हैं, या उसके जीवन को ख़तरा पैदा करते हैं, तो आप दरअसल इस अर्थ में भी हिंसा कर रहे होते हैं कि आप मृत्यु के इस कर्तृत्व को बलात् हथियाने की कोशिश कर रहे होते हैं।

जहाँ तक राज्य की हिंसा और राजद्रोहियों की हिंसा के बीच वैधता और अवैधता के भेद का सवाल है, मुझे लगता है कि इसको गढ़ने में उन तमाम लोगों का योगदान है, जो किसी न किसी रूप में, और जिस किसी भी विवशता के चलते, व्यवस्था में विश्वास करते हैं। जब तक आप किसी व्यवस्था में विश्वास करते हैं, तब तक आप उस व्यवस्था के द्वारा की गयी हिंसा और उस व्यवस्था के मूल में निहित हिंसा का मूलगामी विरोध नहीं कर सकते; बल्कि आप उस हिंसा की ज़िम्मेदारी से भाग नहीं सकते। इसका यह अर्थ नहीं कि आपको विरोध नहीं करना चाहिए। अपने को भारतीय कहने या मानने का अर्थ यह कतई नहीं है कि आपको अपने राज्य द्वारा राज्य की सीमा के भीतर या उसके बाहर किये जाने वाले किसी अतिचार या हिंसा का विरोध नहीं करना चाहिए। लेकिन यह विरोध आप पैडिस्टल पर खड़े होकर नहीं कर सकते। यह विरोध साथ ही साथ आपके स्वत्व के उस अंश का भी विरोध होना चाहिए जो अंश इस राज्य को बनाये रखने में मदद कर रहा है। जब तक कि आप उस व्यवस्था के भीतर हैं और किसी न किसी रूप में उससे लाभान्वित हो रहे हैं, जब तक आप उसके भीतर रहते हुए उसकी सेनाओं से, पुलिस से मिलने वाली सुरक्षा का, उसके द्वारा उपलब्ध करायी गयी तमाम अन्य सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं, तब तक उस व्यवस्था के कृत्यों में आपकी परोक्ष ही सही भागीदारी है। और अगर उसके कृत्यों में आपकी भागीदारी है, तो उसके द्वारा की जा रही, स्वयं आपके विरुद्ध की जा रही, हिंसा में भी आपकी भागीदारी होगी।

इस तर्क को आप राज्य के बाहर भी घटित कर सकते हैं। एक दूसरा राज्य है जो इस राज्य के बाहर है, लेकिन एकबार फिर, ये दोनों राज्य भी किसी एक वृहत्तर व्यवस्था का हिस्सा हैं। वे किसी तीसरी व्यवस्था का उसी तरह हिस्सा हैं, जैसे कि आप इस राज्य का हिस्सा हैं। तो कुल मिलाकर राज्य की हिंसा का मूलगामी विरोध तब तक सम्भव नहीं है जब तक कि आप किसी परम स्वराज्य में या अ-राज्य में न रहते हों। जब कि आप ‘अराजकता’ की पराकाष्ठा पर न रह रहे हों। अराजकता की पराकाष्ठा यानी वह स्तर जहाँ एक शेर के द्वारा किया गया एक हिरण का शिकार हिंसा नहीं है। हिंसा का प्रत्यय हमारा गढ़ा हुआ है। हिंसा अनिवार्यतः मनुष्य की कृति है। वह एक सांस्कृतिक संघटना है।

दीपेन्द्र: अगर दुनिया में हथियारों के भण्डार को देखें, तो यह बात समझ में आती है कि उनसे दुनिया को हज़ारों बार नष्ट किया जा सकता है। हथियारों के भण्डारण का तर्क इस नतीजे की ओर ले जाता लगता है कि अहिंसा की मानवीय आकांक्षा को इन हथियारों ने पूरी तरह से निरर्थक सिद्ध कर दिया है, और हथियारों के इस के ढाँचे के सामने, या हथियारों की यान्त्रिक प्रौद्योगिकी के आगे मनुष्यत्व निरर्थक हो चुका है।

मदन: बिल्कुल। क्या यह सलाह गाँधी जी ने ही नहीं दी थी कि संसार के सारे हथियारों को समुद्र में फेंक देना चाहिए? जिसको आज हम निरस्त्रीकरण कहते हैं, और जो आज महज़ एक नारेबाज़ी बनकर रह गया है, उसकी असल सलाह वही थी; जिसका मतलब यह था कि हमें सब तरह की हिंसा को समुद्र में फेंक देना चाहिए। वह एक सम्पूर्ण अहिंसा का आग्रह था। यह एक असम्भव सी बात लगती है, क्योंकि यह मनुष्य की कल्पना से बाहर है कि वह अपने आपको हिंसा से इतने सम्पूर्ण रूप से अलग कर ले। हिंसा आप इसलिए करते हैं क्योंकि आप डरते हैं। गाँधी जी जब हथियारों को समुद्र में फेंकने की बात कर रहे थे, तो वे सम्पूर्ण भय को समुद्र में फेंकने की बात कर रहे थे। सारे देश जिस तर्क से हथियार बनाते या इकट्ठा करते हैं, वह हमेशा ही सुरक्षा का तर्क होता है। और सुरक्षा केवल अपनी भौगोलिक सीमाओं की नहीं बल्कि अपने तमाम तरह के हितों की सुरक्षा का तर्क उसमें शामिल होता है। इसमें केवल हथियार नहीं बल्कि कूटनीतियाँ, समझौते, प्रतिबन्ध आदि भी हिंसा का कारण बनते हैं। दूसरे को डराने, या धमकाने के लिए इन चीज़ों का भी इस्तेमाल किया जाता है। तो कुल मिलाकर सुरक्षा का तर्क भय पर खड़ा होता है और यह भय अन्ततः दूसरे में भय पैदा करने, और फिर उस दूसरे को अपने भय के निराकरण के लिए अपना सुरक्षातन्त्र खड़ा करने, यानी हथियारों का ज़खीरा खड़ा करने, का कारण बनता है। एक दुश्चक्र। आज का ‘आतंकवाद’ शायद इसी दुश्चक्र की उपज है।

दीपेन्द्र: नाभिकीय हथियारों के बारे में यह तर्क दिया जाता है कि तीसरा विश्वयुद्ध इसलिए नहीं हुआ क्योंकि नाभिकीय हथियार ईज़ाद कर लिये गये हैं, और इन हथियारों ने ही युद्ध की सम्भावनाओं को स्थगित रखा हुआ है। क्या कारण है कि ‘आतंकवाद’-विरोधी विमर्श में प्रायः हथियारों की वैधता को लेकर सवाल नहीं उठाये जाते! मुझे लगता है कि इस विमर्श में जब तक निरस्त्रीकरण की आकांक्षा को जगह नहीं मिलती तब तक वह एक आत्मविभाजित विमर्श ही होगा।

मदन: हाँ, इससे तो मैं तत्काल सहमत हूँ। लेकिन इसमें आपने एक बड़ी दिलचस्प बात कही है कि यह कहा जाता है कि नाभिकीय आयुध तीसरे विश्वयुद्ध के न होने के लिए ज़िम्मेदार हैं। इससे ज़्यादा अन्तर्विरोधी और आत्मछल से भरी हुई कोई दूसरी बात नहीं हो सकती। हथियार हमेशा युद्ध को भड़काते हैं; वे हमेशा युद्ध की सम्भावना को बढ़ाते हैं, उसको ख़त्म नहीं कर सकते। यूँ भी, न सही विश्वयुद्ध, पर युद्ध तो हो ही रहे हैं, परमाणु हथियारों के बावजूद। विश्वयुद्ध के न होने से या उसके स्थगित होने से जो तथाकथित शान्ति है, उसको भयमूलक शान्ति ही कहा जाएगा, जोकि अपने आप में एक वदतोव्याघात (Contradiction in terms) होगा। शान्ति या अहिंसा भयमूलक नहीं हो सकती; वह भय-मुक्ति से ही सम्भव है, जबकि हथियार भय पैदा करते हैं। इसलिए परमाणु आयुध अगर कुछ कर रहे हैं, इस सन्दर्भ में, तो वे केवल तनाव को सघन, गहन और तीखा ही कर रहे हैं। तीसरी लड़ाई का न होना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि उसका आसन्न बने रहना है। तीसरे विश्वयुद्ध के न होने के कारण जो तथाकथित शान्ति है उसका कोई सम्बन्ध परमाणु हथियारों से नहीं है। यह कृत्रिम शान्ति है; तूफान के पहले की शान्ति। आप देखें कि शान्त रस का अनुभाव समभंग का होता है, उसमें कोई विक्षेप नहीं होता। वह शान्ति किसी भी तरह के उद्वेगों, उद्वेलनों से मुक्ति की स्थिति में आती है। भय की स्थिति परम विक्षेप की स्थिति होती है। और आप कह सकते हैं कि भय का सबसे बड़ा विक्षेप, इस वक़्त, सभ्यता के स्तर पर, ‘आतंकवाद’ हैं।

दूसरी बात यह कि तीसरी लड़ाई जो कर सकती है, मनुष्य का जो भौतिक विनाश उसमें होने की सम्भावना है, वह विनाश तो, खुदा का शुक्र है, तब तक रुका रहेगा जब तक कि ये पटाखे नहीं फूट जाते, लेकिन जिस भय ने इन हथियारों को पैदा किया है, और उन हथियारों की रक्षा के लिए, उनका औचित्य सिद्ध करने के लिए जो कुछ भी दुनिया के वे ताक़तवर लोग कर रहे हैं जिनके पास ये हथियार हैं, वह मनुष्यता के विनाश का एक दूसरा रूप है: सांस्कृतिक नरसंहार, ‘आतंकवाद’, वैश्विक आर्थिक मन्दी के चलते लाखों लोगों के बेरोज़गार हो जाने की सम्भावना, चारों ओर व्याप्त हो रही असंवेदनशीलता…। दुनिया बनी रहे, और यही शुभकामना हमको करनी चाहिए, लेकिन कभी-कभी यह भी लगता है कि जिस तरह की दुनिया बनी रहने वाली है, जिस तरह की दुनिया हम लोग बनी रहने देने वाले हैं, उस तरह की दुनिया के बने रहने का क्या अर्थ होगा! यह तो कोई ख़ास अर्थपूर्ण बात नहीं है कि मनुष्य की एक निष्क्रिय और निरर्थक उपस्थिति रह जाय, जिसमें कि वो कुछ भी न कर सके। सौभाग्य से इतनी भीषण नाउम्मीदी की हालत अभी नहीं है, और यह उम्मीद हम कर सकते हैं कि अगर पृथ्वी बची रही और उसमें इन्सान बचे रहे, और उनमें वे थोड़े से लोग ( जो उतने थोड़े भी नहीं हैं ) बचे रहे जिनको इन सब चीज़ों की चिन्ता है तो…। लेकिन इन लोगों का सांवेदनिक जीवन, इनकी जिजीविषा सुरक्षित रह सके, यह बहुत ज़रूरी है। इसका नष्ट होना ही दरअसल संसार का नष्ट होना है।

दीपेन्द्र: कल आपने एक अच्छी बात कही थी कि जिसे ‘आतंकवादी’ कहा जा रहा है, वह स्वयं आतंकग्रस्त है। इसी के साथ-साथ यह भी लगता है कि यह दरअसल कुछ समुदायों के आत्म-अलगाव की भी एक तरह की अभिव्यक्ति है; ऐसे समुदाय जो यह महसूस कर रहे हैं कि वे वैश्विक स्तर पर अन्याय का शिकार हैं, उनकी उपेक्षा हो रही है, उसको हाशिये पर धकेल दिया गया है, उनको अपवर्जित कर दिया गया है। ‘आतंकवाद’ को इन तमाम चीज़ों के ख़िलाफ़ आत्माभिव्यक्ति की कोशिश की तरह भी देखा जा सकता है।

मदन: निश्चय ही। एक बम-विस्फोट कर वे एक सन्देश देना चाहते हैं, जिसके लिए आपने एक शब्द इस्तेमाल किया है: अभिव्यक्ति। हालाँकि अभिव्यक्ति का यह ढंग अपने आप में नृशंसता के स्तर को छूता है, और उसमें अन्धापन और अविवेक भी साफ़ दिखायी देता है।

दीपेन्द्र: ‘सेक्युलरिज़्म’ आधुनिकता का एक प्रबल मूल्य है। आत्मसंरक्षण उसका एक दूसरा परम मूल्य है जिसमें व्यक्तिवाद भी स्थापित होता है। इस आत्मसंरक्षण के बरक्स ‘आतंकवाद’ की विचारधारा को देखें, तो जिसे ‘आतंकवादी’ कहा जा रहा है, उसने, लगता है, अपने मृत्यु-भय को उत्तीर्ण कर लिया है। न केवल मृत्यु-भय को उत्तीर्ण कर लिया है, बल्कि आत्म-उत्सर्ग में भी उसने अपने आपको झोंक दिया है; मानो अपने अस्तित्व की वैधता वह इस संसार में नहीं बल्कि किन्हीं अलौकिक स्रोतों में ढूँढ रहा है। तो इसको कैसे समझा जाय? यथार्थवादी दृष्टि से तो इसको मिथकीय वैधता कहा जाएगा। पर इस मिथकीय वैधता में इस कथित ‘आतंकवादी’ की परम आस्था भी है।

मदन: जिसको हम ‘सेक्युलरिज़्म’ कहते हैं वो मूलतः मनुष्य को, उसके कर्तृत्व को, सृष्टि के केन्द्र में मानने का, मनुष्य को अन्तिम रूप से कर्ता मानने का विचार-दर्शन है। ‘सेक्युलरिज़्म’ कहता है कि दुनिया को मनुष्य के दृष्टिकोण से देखा, समझा जाय और बदला जाय। व्यक्ति को इसी मनुष्य के सत्व के रूप में देखने की कोशिश की गयी है। इस दृष्टि से देखें तो ‘आतंकवादी’ गतिविधि में मुब्तिला इन्सान न केवल कोई व्यक्ति नहीं है, बल्कि वहाँ व्यक्तिवाद का भी उत्सर्ग है। और व्यक्तिवाद का यह उत्सर्ग कुल मिलाकर मनुष्यकर्तृत्ववाद का भी उत्सर्ग है। उत्सर्ग का प्रत्यय यहाँ बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह एक धर्ममूलक प्रत्यय है। मानव-बम के सन्दर्भ में आत्मघात सही शब्द नहीं है। मैं नहीं समझता की ‘आतंकवादियों’ के दर्शन में आत्महत्या के लिए कोई मूल्य का दर्जा प्राप्त हो सकता है। अगर आत्महत्या को कहीं कोई नैतिक स्वीकृति मिल सकती है तो वह आधुनिक सोच, आधुनिक मानस के भीतर ही मिल सकती है; उसी मानस के भीतर जो व्यक्तिवाद और ‘सेक्युलरिज़्म’ को महत्त्व देता है। धार्मिक दृष्टि से, आपको मिला हुआ जीवन, आपको मिली हुई देह ईश्वर की देन है और इसीलिए आपको कोई हक़ नहीं है कि आप ईश्वर के विधान में हस्तक्षेप करते हुए उस जीवन को अपनी इच्छा या अपनी तानाशाही से समाप्त कर सकें। इसलिए जब कोई इन्सान एक मानव-बम के रूप में विस्फोट करता है तो वह आत्महत्या नहीं करता, बल्कि वह कहीं न कहीं उत्सर्ग के विचार से प्रेरित होता है। वह धर्म की ख़ातिर अपना उत्सर्ग कर रहा होता है। क्योंकि उसका जो चरम दाँव है वो धर्म है। यह बिल्कुल अलग बात है कि वह धार्मिकता एक बहुत ही कट्टर स्तर पर उठी हुई होती है। पर इस कट्टरता के रूप हम इतिहास में बहुत पहले से देखते आये हैं। हम विशेष रूप से सामी धर्मों के इतिहास में यह देखते आये हैं कि धर्म या धार्मिक विश्वासों की रक्षा के लिए लोगों ने तमाम तरह की हिंसाएँ की हैं। तो कुल मिलाकर यह धार्मिकता या अलौकिकता और लौकिकता या सेक्युलरिज्म के बीच का द्वन्द्व है; आस्तिकता और नास्तिकता के बीच का द्वन्द्व। अगर ‘आतंकवादियों’ को इस बात का विश्वास हो जाए कि ईश्वर उनके इस कृत्य से प्रसन्न नहीं है, तो वे शायद पहले व्यक्ति होंगे जो इसको छोड़ देंगे।

दीपेन्द्र: अभी ‘आतंकवाद’ का जो विमर्श बन रहा है उसमें प्रायः व्यवस्था ही एक तरह से ‘आतंकवाद’ का नामकरण कर रही है। पर इस नामकरण के इतिहास को ध्यान से देखें तो जब ज्योनिस्ट मूव्हमेण्ट जर्मनी में चल रहा था और यहूदी लोगों को जब इज़राइल में बसाया गया, तो उसके पीछे पवित्र पुस्तक, मतलब बाईबिल, का ही ‘प्रॉमिस्ड लैण्ड’ का तर्क था और उसी तर्क के तहत यहूदियों के दैवीय अधिकार को अधिमान्यता देते हुए तथाकथित सेक्यूलर स्टेट ने वहाँ उनको बसाया, और फिलिस्तीनी लोग, जिनका उस ज़मीन पर नैसर्गिक अधिकार था, जो सदियों से वहाँ पर रह रहे थे, उन्हें वहाँ से बेदखल किया गया। सबसे बड़ी बात यह है कि इसे अन्तरराष्ट्रीय विधि द्वारा मान्यता भी दी गयी। जिन फिलिस्तीनियों को बहिष्कृत किया गया, वे दरअसल एक निरुपाय या निर्विकल्प परिस्थिति में थे। उनके पास जीने का कोई भी विकल्प नहीं बचा था, न्याय की उनकी सारी गुहार लगातार विफल हो रही थी, तब जाकर सम्भवतः उन्होंने मजबूर होकर ‘आतंकवाद’ को अपना माध्यम बनाया। यूँ पश्चिमी सभ्यता की आत्मछवि यह है कि वह ‘रीज़न’ या शुद्ध बुद्धि के तर्क पर खड़ी है, लेकिन ध्यान से देखने पर हम पाएँगे कि इसमें अन्यता को निरन्तर खारिज़ किया गया है, और यूरो-अमरीकी सभ्यता ने लगातार शक्ति का केन्द्रीकरण और संरक्षण किया है। तो एक तरह से, यहाँ ‘रीज़न’ या बुद्धि का इस्तेमाल अपनी ताक़त को बढ़ाने के लिए किया गया है। ‘आतंकवाद’, इस परिप्रेक्ष्य में, अन्यता के निषेध को प्रतिरोध देने के रूप में भी सामने आता है।

मदन: इतिहास की विडम्बना देखिये कि किसी समय में इन्हीं यहूदियों के साथ यूरोप में वही सब अत्याचार हुए थे जो आज इज़राइल फिलिस्तीनियों के साथ कमोबेश कर रहा है। मेरा इशारा नाज़ियों द्वारा किये गये अत्याचारों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अगर इतिहास की मेरी जानकारी इस मामले में ग़लत नहीं है, तो पूरे यूरोप में ईसाई जगत भी यहूदियों के प्रति बहुत उदार नहीं रहा। मुसलमानों के प्रति तो वह घनघोर अनुदार रहा ही। और यह अनुदारता ‘रीज़न’ के युग में बरकरार रही है। आज इज़राइल जो फिलिस्तीनियों के साथ कर रहा है, उसमें, हम जानते हैं कि अकेला इज़राइल शामिल नहीं है। उसे बहुत बड़ा समर्थन उस दुनिया का प्राप्त है जिसको कि हम यूरो-अमरीकी दुनिया कहते हैं और जो ईसाई जगत भी है। यह वह दुनिया है जो ‘रीज़न’ का दावा करती है। जो कुछ भी इस ‘रीज़न’ के नाम पर या उसके बावजूद किया गया है, उसके साथ जब हम ‘रीज़न’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो यह अपने आप में वदतोव्याघात जैसा लगता है। या फिर यह कहना चाहिए कि यह ‘रीज़न’ का अपना अभिशाप है। एक पूरी की पूरी सभ्यता को उसके नैसर्गिक आवास से विस्थापित करना…। एक समय तक कम्युनिस्टों के द्वारा जो भी किया जाता था अमेरिका के हिसाब से वह आतंक का कृत्य हुआ करता था। यह अलग बात है कि कम्युनिस्ट साम्राज्य खुद अपने लोगों के साथ आतंक की पराकाष्ठा पर गया था। ये सब ‘रीज़न’ के ही रीज़न हैं। यह सब वहीं हुआ जहाँ तर्कबुद्धि को, शुद्ध बुद्धि को बहुत महत्त्व दिया गया। इनके बिना न आप साम्यवाद की कल्पना कर सकते हैं, न अमेरिका के महादेश होने की कल्पना कर सकते हैं, और न योरोप के इतने बड़े उपनिवेशवादी और दुनिया पर शासन करने की महत्त्वाकांक्षा पालने वाले महाद्वीप की कल्पना कर सकते हैं।

‘आतंकवादियों’ के मनोविज्ञान में कहीं न कहीं यह भी है कि योरोप द्वारा उनकी संस्कृति को, उनकी आस्था के सम्बलों को, उनके मूल्यों को, दुनिया से विस्थापित किया जा रहा है; एक तरह का सांस्कृतिक फिलिस्तीन आप इस दुनिया में जगह-जगह गढ़ रहे हैं। जिन लोगों ने इस ‘रीजन-ओरिएण्टेड’ आधुनिकता को स्वीकार कर लिया है, उनके लिए कोई मुश्किल नहीं है। लेकिन जिनने स्वीकार नहीं किया है, उनका अगर यह बोध हो कि उनको सांस्कृतिक रूप से विस्थापित किया जा रहा है, तो यह बहुत अस्वाभाविक नहीं है। इस नामकरण- ‘आतंकवाद’ -पर इस परिप्रेक्ष्य में भी सोचने की ज़रूरत है। एक देश लगातार रेटॉरिक उगलता रहता है कि एक दूसरे देश के पास मास-डिस्ट्रक्शन के हथियार हैं और वह दुनिया के लिए बहुत बड़ा ख़तरा बना हुआ है। लेकिन यह देश जब हज़ारों मील दूर से आकर उसपर आक्रमण करता है, और अमेरिका ने ऐसा एक से अधिक जगहों पर किया है, तो इसको हम इस शब्द (‘आतंकवाद’) की ज़द में क्यों नहीं लाते? कोई नहीं कहता कि अमेरिका ने ‘आतंकवादी’ गतिविधि की है। कम से कम लोकप्रिय विमर्श में यह चीज़ नहीं है। परम्परागत युद्धों में महत्त्वाकांक्षाएँ और मूल्य आमतौर से बहुत साफ़ हुआ करते थे। उन्हें हम आज के, आधुनिक, विवेक से सामन्तवादी आदि कहते हैं। पर आज के युद्ध जो रीज़न के तर्क से किये जाते हैं, उन परम्परागत युद्धों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा मनुष्यविरोधी ठहरते हैं। प्रजातन्त्र कितना ही बड़ा मूल्य हो, लेकिन आप यह बलात तय करने वाले कौन होते हैं कि प्रजातन्त्र जब तक सार्वभौम नहीं होगा तब तक वह एक खण्डित उपलब्धि ही होगी। आप सारी दुनिया में प्रजातन्त्र को स्थापित करने के लिए किन्हीं देशों के नागरिकों की हत्या करें, उनके देश को बमों से तबाह कर दें, उनकी आधार-रचना को इस तरह पंगु बना दें कि वे दशकों तक न उठ सकें…। आज जब हम इतिहास पढ़ते हैं तो इस बात को बड़े दर्द के साथ याद करते हैं कि दूसरे विश्वयुद्ध ने कितनी बड़ी तबाही की थी और हिटलर ने ये किया और कम्युनिज़्म ने वो किया आदि, लेकिन इस पर कम बात होती है कि ईराक की जो तबाही हाल ही के वर्षों में हुई उससे वह देश केवल भौतिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी कब-कैसे अपने आत्मविश्वास को पा सकेगा, और उस आत्मविश्वास को पाने में यह बलात आरोपित प्रजातन्त्र कितनी मदद कर पाएगा। क्योंकि यह प्रजातन्त्र उनकी अपनी व्यवस्था के भीतर से निकला हुआ नहीं है।

आधुनिक युग में हम अन्य से नफ़रत के अन्यान्य रूप देखते हैं, जिनमें ‘अनाधुनिक’ भी एक अन्य है, जिनमें पारम्परिक समाज भी एक अन्य है। कायदे से, अगर आधुनिकता सहिष्णुता और प्रजातन्त्र जैसे तत्त्वों से निर्मित है, अगर उसमें ‘काउण्टरप्वाइण्ट’ एक बहुत बड़ा मूल्य है, तो फिर आधुनिकता के भीतर उसके ‘काउण्टरप्वाइण्ट’ के लिए भी गुंजाइश होनी चाहिए। तभी वह अपने ही मूल्यों की कसौटी पर खरी मानी जाएगी। लेकिन क्या आधुनिकता के भीतर उसके ‘काउण्टरप्वाइण्ट’ के लिए वाकई गुंजाइश है? गहरी धार्मिक आस्था का जीवन बिताने वाले पारम्परिक समाजों के लिए, आदिवासियों के लिए क्या उसमें गुंजाइश है – उन लोगों के लिए जो प्रगति को दो कौड़ी की चीज़ मानते हैं, जो सेक्युलरिज़्म को ग़लत मानते हैं? इस तरह के तमाम समुदाय आधुनिकता के ‘काउण्टरप्वाइण्ट’ हैं, जिनको उसने हमेशा ही एक नफ़रत करने योग्य और अनिवार्यतः नेस्तनाबूत करने योग्य अन्य के रूप में देखा है।

दीपेन्द्र: आपने शुरू में कहा था कि ‘आतंकवाद’ उनके लिए हमारे द्वारा दिया गया नाम है। इस दृष्टि से देखें तो इस संघटना के इर्दगिर्द विकसित विमर्श के प्रतिमान, दरअसल, राष्ट्र-राज्य व्यवस्था ही विकसित कर रही है। और विमर्श की इन स्थापित व्यवस्थाओं में ‘आतंकवादियों’ की कोई आस्था नहीं है। इन परिस्थितियों को देखकर आपको नहीं लगता कि विमर्श के प्रतिमान भी बदलने चाहिए? अगर राष्ट्र्र-राज्य व्यवस्था उनके साथ संवाद करना चाहती है और समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है तो विमर्श के स्थापित प्रतिमानों में कुछ दरारें लाना होंगी?

मदन: बिल्कुल। उनका कोई विमर्श नहीं है। उनकी कार्रवाई से मिले कुछ संकेतों के आधार पर, उनके पक्ष से हमारे द्वारा गढ़ा गया विमर्श है। हो सकता है जो बातचीत हम कर रहे हैं, वह भी उसी प्रकृति का विमर्श हो। शायद वे इस समूचे संकट को, विमर्श का विषय नहीं मानते, कार्रवाई का विषय मानते हैं। यह एक बहुत ख़तरनाक स्थिति है। अगर उनका कोई एक विमर्श होता तो वह इस समस्या के हल में शायद कुछ मदद कर सकता। तो पहला सवाल तो यही है कि क्या विमर्श में उनका विश्वास है। और अगर नहीं है, तो ये सोचने की बात है कि ऐसा क्यों है। अक्सर इस तरह की हिंसक गतिविधियों की शुरूआत दरअसल वहीं होती है जहाँ संवाद की गुंजाइश ख़त्म हो जाती है। तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि संवाद पर से उनका विश्वास उठ जाने के नतीजे में ऐसा हुआ हुआ हो, जिसके नतीजे में वे सीधी कार्रवाई पर उतर आये? यह अटकल तो कम से कम लगायी जा सकती है। संस्कृति के इतिहास में इस बात की खोज बहुत आसानी से की जा सकती है कि पिछली कुछ सदियों में विमर्श की जो परम्परा विकसित हुई है, उसने अन्य को, अन्य के विचार को, अन्य की आस्था को, कितना अवकाश दिया है; कितनी कोशिश उनको विमर्श के दायरे में लाने की हुई है, और कितनी कोशिश विमर्श को इतना लचीला बनाने की हुई है कि अन्य का मत, अन्य का कन्विक्शन उसमें गुंजाइश पा सके। क्योंकि अगर वह गुंजाइश नहीं रखी गयी है, तो फिर उनसे उम्मीद करना कि वे विमर्श का रास्ता चुनें, कैसे सम्भव है? वे कार्रवाई के रास्ते ही आप तक पहुँचेंगे और कार्रवाई के रास्ते ही आप उनका सामना करेंगे, जोकि आप कर ही रहे हैं।

दीपेन्द्र: मुझे ऐसा लगता है कि विमर्श के स्थापित प्रतिमानों से अलग ‘आतंकवादी’ अपनी ओर से विमर्श का एक संकेत तो कर रहे हैं। वह संकेत उनकी कार्रवाई में निहित है। वह अपनी देह में ही एक संकेत की तरह प्रस्तावित की जा रही है। वह कार्रवाई किसी और बिन्दु की ओर संकेत कर रही है। और ऐसा करते हुए वह कार्रवाई ‘काउण्टर-साइन’ भी हो रही है, अर्थात उसकी जवाबदेही ली जा रही है। पर व्यवस्था उस संकेत को पढ़ना नहीं चाहती है। उल्टे उस संकेत की अवमानना कर रही। यह सही है कि यह संकेत बहुत कूटबद्ध है, पर निश्चित रूप से वह संकेत विमर्श की दिशा में है।

मदन: ठीक बात है। हम ‘आतंकवाद’ की भौतिक बनावट को, उसकी स्थूलता को सबसे ज़्यादा लक्षित करते हैं। हम बम को लक्षित करते हैं, उस शरीर को लक्षित करते हैं जिसने उसको बाँध रखा था, उन निशानों को जो घटना के बाद छूट जाते हैं, गाहे-ब-गाहे पकड़ लिये गये या मारे गये ‘आतंकवादी’ को, और उसकी वजह से हुई भौतिक तबाही को लक्षित करते हैं। आप कह सकते हैं कि हम यूँ ‘आतंकवाद’ की अभिधा पर ध्यान देते हैं, पर उसकी व्यंजना पर ध्यान नहीं देते हैं, जिसको आप ‘संकेत’ कह रहे हैं। यह संकेत बहुत कूटबद्ध है, यह बात सही है, लेकिन वह इतना भी कूटबद्ध नहीं है कि उसको पढ़ा न जा सकता हो- ख़ासकर एक ऐसे समाज के भीतर जो शुद्ध बुद्धि के डिजिटल स्तर पर उठा हुआ है। हम शायद उसको पढ़ना नहीं चाहते, जैसा कि आप कह रहे हैं। ‘आतंकवाद’ एक ऐसी स्क्रिप्ट या एक ऐसी पुस्तक है…

दीपेन्द्र: एक ऐसा ‘सिग्नीफायर’ …

मदन: हाँ, जिसका रचयिता तो है, लेकिन जिसका कोई पाठक नहीं है। तो वह एक अपठित, पढ़े जाने की इच्छा से वंचित संकेत या कूट है। इससे भी ज़्यादा, जो किया जा रहा है, वह उसका अपपाठ या कुपाठ है। और उसको तरीके से पढ़ने की कोशिश उसी वजह से नहीं है जिस वजह से ‘आतंकवाद’ पैदा होता है। जिस विमर्श के भीतर उसको पढ़ा जा सकता है वह विमर्श हमने विकसित ही नहीं किया है। हमने उसका अपवर्जन किया है। वह एक अपवर्जित अनुभव है। उस अनुभव की गुंजाइश आपकी आधुनिकतावादी विमर्श-परम्परा के भीतर नहीं है। और उसका अपठन या अपपठन उसको और ज़्यादा भड़काता है। यह कैसे सम्भव होता है कि वह अभागा हत्यारा हमारी संवेदना के दायरे में प्रवेश नहीं कर पाता जो अपने सीने से बम बाँधकर अपने को उड़ा देता है! इस व्यक्ति का, उसके इस अन्तर्विरोध का कि वह अस्तित्व के किसी रूप को हासिल करने के लिए अपना अस्तित्व खत्म कर रहा है, अपठित बना रहना, पढ़ने की हमारी सामर्थ्य की सीमा को बताता है। और उसको न पढ़े जाने के कारण ही शायद वह कूट दुरूह बनता है।

दीपेन्द्र: और उसको पढ़े जाने की शायद यह भी शर्त है कि आप अपने को पढ़ें। और आप अपने को पढ़ना नहीं चाहते।

मदन: बिल्कुल। यह पठन के कर्म में ही निहित है, क्योंकि कोई भी पठन साथ ही साथ आत्मपठन भी होता है। कोई भी व्यक्ति जिसमें अपना उत्सर्ग करने की, अपने को दाँव पर लगाने की, अपने को प्रश्नवेध्य बनाने की, सामर्थ्य नहीं है, वो पाठक नहीं हो सकता। और इस मामले में हमारी सभ्यता उत्तरोत्तर एक अपाठक सभ्यता होती जा रही है। वह पढ़ने की सामर्थ्य खोती जा रही है।

दीपेन्द्र: ‘एण्टी-रीडर’…

मदन: हाँ, एक तरह से। क्योंकि ‘नॉन-रीडर’ से ही ‘एण्टीरीडर’ की यात्रा शुरू होती है। ‘नॉन-रीडर’ अपनी ‘नॉन-रीडरशिप’ को सुरक्षित करने के लिए अन्ततः ‘एण्टीरीडर’ की भूमिका निभाने लगता है…

दीपेन्द्र: वह नहीं चाहता कि दूसरे लोग पढ़ें…तो वह पढ़ने को ही सेंसर करना चाहता है…

मदन: …जो कि हमारे वक़्त में होता रहा है। तो आपकी यह अटकल बिल्कुल सही है कि खुद को पढ़ने की असमर्थता इसके पीछे है। क्योंकि उसमें आपको खुद को दाँव पर लगाना होगा। जैसे ही आप उसको पढ़ेंगे आप खुद को पढ़ना शुरू कर देंगे। और आप फिर उस पूरे इतिहास में जाने को विवश होंगे जहाँ से यह गतिरोध शुरू हुआ; जहाँ से आपने उनके कूटों को पढ़ना बन्द कर दिया है। न केवल बन्द कर दिया है बल्कि आपने एक ऐसा अर्थतन्त्र गढ़ लिया जिसमें कि उनकी वाणी, उनकी आवाज़, उनके संकेत व्याख्येय ही नहीं हैं।

निश्चय ही ‘आतंकवाद’ जिस वैकल्पिक विमर्श की माँग करता है, वह ‘आतंकवाद’ के सम्पूर्ण निषेध के बिना सम्भव नहीं है, किन्तु तभी जब यह निषेध ‘आतंकवाद’ को समझने का भी पर्याय बन सके। इस वैकल्पिक विमर्श में फिर वे लोग शामिल होंगे जो भविष्य के सम्भावित ‘आतंकवादी’ हैं।

यह बातचीत प्रतिलिपि पर कुछ समय प्रकाशित हो चुकी है, इस लेख के अलावा अन्‍य महत्‍वपूर्ण चर्चाओं, विमर्शों के लिए इस पत्रिका को देखा जा सकता है। प्रतिलिपि पर जाने के लिए यहां क्लिक करें

Wednesday, November 5, 2008

यह पूरी तरह जंग है और दोनों ही पक्ष अपने-अपने हथियार चुन रहे हैं: अरुंधति रॉय

(अरुंधति रॉय से शोमा चौधरी की बातचीत)

आज पूरे देश में जो हिंसा का माहौल बना हुआ है; आप इन चीजों को कैसे देखती हैं? इनके क्या कारण हैं? इसे किस संदर्भ में देखा जाना चाहिए?
यह सब देख पाने के लिए विद्वान होना कोई जरूरी नहीं है। हमारे बीच एक ऐसा मध्यमवर्ग बढ़ रहा है, जिसमें स्वछंद-उपभोक्तावाद और बेतहाशा लालच पनप रहा है। इसके लिए औद्योगिक पश्चिमी देशों ने तो संसाधनों की लूट व 'श्रमिक-दासों' के लिए उपनिवेश कायम कर लिए थे। लेकिन हमने तो अपने भीतर ही उपनिवेश कायम कर लिए हैं और खुद को ही खाना शुरू कर दिया है। बाजारीकरण के लिए बढ़ाया गया यह बेतहाशा लालच, ( इसे ही राष्ट्रवाद के रूप में बेचा जा रहा है) लालच की प्यास गरीबों से उनकी जल-जंगल और जमीन को लूट करके ही बुझा सकते हैं।
आजाद भारत में जो सबसे सफल अलगाववादी आन्दोलन हम देख रहे हैं, वह यह है कि उच्च और मध्यम वर्ग ने अपने आपको पूरे देश से काट लिया है, यह संघर्ष लम्बवत है, क्षैतिज नहीं। वे वैश्विक प्रभु वर्ग में शामिल होकर एक अलग स्वर्ग बना लेना चाहते हैं, क्योंकि वे इसे अपना हक समझते हैं। उसने कोयला, खनिज, बाक्साइट, पानी और बिजली आदि सभी संसाधनों पर पहले ही कब्जा जमा लिया है। अब उन्हें और ज्यादा कारें, और ज्यादा बम, और ज्यादा खदानें- सुपरपावर्स के नागरिकों के लिए सुपरट्वायज (बम, मिसाइल आदि) बनाने के लिए गरीबों के जमीन की जरूरत है। यह पूरी तरह एक जंग ही है, जहाँ अमीर-गरीब दोनों तरफ के लोग अपने-अपने हथियार चुन रहे हैं। उच्च वर्ग की बेतहाशा लालच को पूरा करने के लिए ही सरकार और बहुराष्ट्रीय कंपनियां ढ़ांचागत समायोजन में जुटी हैं, इस व्यवस्था को विश्व बैंक, एफडीआई (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश), एडीबी (एशियन विकास बैंक), न्यायालय के आदेश, नीति-निर्माता, कार्पोरेट मीडिया और पुलिस आदि मिलकर सब के सब जनता की गर्दन दबा रहे हैं। इसके विपरीत, जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं; उन्होंने धरने, भूख हड़ताल और सत्याग्रह किये, न्यायालय गए और हर उस काम को किया, लेकिन राहत नहीं मिली, इसलिए अब वे हताश होकर बंदूक उठा रहे हैं।

क्या ये हिंसा बढ़ेगी?
अगर जनता की प्रगति और सम्पन्नता मापने का बैरोमीटर सेंसेक्स और विकास दर ही है, तो निश्चित रूप से हिंसा बढ़ेगी। मैं इस सबको किस रूप में देखती हूं? इन चीजों को देखना ज्यादा मुश्किल नहीं है, यह तो साफ-साफ दिखाई दे रहा है। बीमारी तो सिर चढ़ गयी है।

आपने एक बार कहा था कि चाहे मैं हिंसा का सहारा नहीं लूगीं लेकिन देश के हालात को देखकर उसकी निंदा करना मैं अनैतिक मानती हूं। क्या इसे आप तफसील से बता सकती हैं?
गुरिल्ला बनकर तो मैं बोझ बन जाउंगी! मुझे शक है कि मैंने 'अनैतिक' शब्द का प्रयोग किया होगा, 'नैतिकता' शब्द गिरगिट जैसा हो गया है, जो माहौल देखकर रंग बदल लेता है। मैं ऐसा महसूस करती हूं कि अहिंसक आंदोलन, दशकों से इस देश की हर लोकतांत्रिक संस्था का दरवाजा खटका रहे हैं, लेकिन वे उपेक्षित और अपमानित ही हुए हैं। भोपाल गैस पीड़ितों या नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) को ही देख लीजिए। नर्मदा बचाओ आंदोलन के पास किसी भी दूसरे जनांदोलनों के अपेक्षा एक रसूखदार नेतृत्व, मीडिया कवरेज और संसाधन थे। लेकिन हुआ क्या? आज लोग रणनीति पर पुनर्विचार के लिए बाध्य हो गये हैं। आज जब सोनिया गांधी दावोस के वर्ल्ड इकॉनामिक फ़ोरम का गुणगान कर रहीं हैं, तो हमारे लिए यह सोचने और चौंकने का समय है। उदाहरण के तौर पर क्या आज एक लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य में सविनय अवज्ञा करना संभव रह गया है? क्या यह ऐसे युग में संभव है, जबकि मीडिया बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा नियंत्रित है और गलत सूचनाएँ जनता तक पहुँचा रहा है? क्या भूख हड़ताल और 'सेलिब्रेटी पोलिटिक्स' के बीच नाभिकीय रिश्‍ता हो गया है? अगर नांगला मांछी या भाटी माइन्स के लोग भूख हड़ताल करने लगें तो क्या कोई उनकी परवाह करेगा? इरोम शर्मिला पिछले छ: सालों से भूख हड़ताल पर है। यह हममें से कइयों के लिए सबक भी है। मैंने हमेशा यह महसूस किया है कि यह एक माखौल की बात है कि ऐसे देश में जहाँ अधिकांश लोग भूखे रहते हैं; वहाँ भूख हड़ताल को राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अब जमाना बदल गया है, हमारे शत्रु का स्वरूप बदल गया है। हम एनजीओ के युग में प्रवेश कर चुके हैं या कहें कि हम 'पालतू शेर' के एक युग में प्रवेश कर चुके हैं, जहां जनांदोलन का रास्ता भी फिसलन भरा हो सकता है। पैसे देकर प्रदर्शन और प्रायोजित धरने कराए जाते हैं, सोशल फोरम बनाए जाते हैं, जो लड़ाकू प्रवृत्ति रखने की नाटकीय भूमिका अदा करते हैं, लेकिन वह जो उपदेश देते हैं, खुद उसका कभी पालन नहीं करते। हमारे पास भिन्न-भिन्न तरह के 'आभासी' विरोध होते हैं। सेज बनाने वाले ही सेज के खिलाफ़ बैठकों को प्रायोजित कर रहे हैं। पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियां ही पर्यावरण सुरक्षा और सामुदायिक कार्यों के लिए पुरस्कार और सहायता दे रही हैं। उड़ीसा के जंगलों में बाक्साइट का उत्खनन करने वाली कंपनी 'वेदांता' अब विश्वविद्यालय शुरू करना चाहती है। टाटा के दो चैरिटेबल ट्रस्ट हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देश भर के जनांदोलनों और आंदोलनकारियों को पैसे दे रहे हैं, क्या यही कारण तो नहीं है कि सिंगूर की आलोचना नंदीग्राम से कम हो रही है (घ्‍यान देने की बात है कि यह साक्षात्‍कार सिंगूर प्रकरण से पहले का है)और शायद इसीलिए न तो उन्हें निशाना, न ही बहिष्कार व घेराव किया गया है।
निश्चित रूप से टाटा और बिड़ला ने गाँधी को भी पैसा दिया था- शायद वही (गांधी) हमारे पहले एनजीओ थे। लेकिन आज के एनजीओ तो बहुत शोर करते हैं, बहुत सी रिपोर्ट लिखते हैं, लेकिन सरकार को इनसे किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं है। पूरे राजनीतिक माहौल में भाड़े के लोग अपनी नौटंकी को ही असली राजनीति साबित करने में जुटे हैं। दिखावे का प्रतिरोध आज बोझ बन गया है।
एक समय था जब जनांदोलन न्याय के लिए न्यायालय की तरफ़ देखते थे, लेकिन अब तो न्यायालयों ने पक्षपातपूर्ण फैसलों की झड़ी लगा दी है, अनेकों ऐसे निर्णय दिए हैं, जो अन्यायपूर्ण हैं, जिनमें गरीबों की इतनी बेइज्जती की जा रही है और जो भाषा इस्तेमाल की गयी है, उससे तो हलक सूख जाता है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फ़ैसले में वसन्तकुंज मॉल के पुन:निर्माण की आज्ञा दी है, हालांकि इसके पास आवश्यक कानूनी मंजूरी भी नहीं है। इस फैसले में न्यायालय ने कहा कि किसी भी कारपोरेशन द्वारा गोरखधंधा करने का सवाल ही नहीं उठता है। (मॉल अब बन चुका है)
बहुराष्ट्रीय भूमंडलीकरण के दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भूमि हड़पने, एनरॉन और मोन्सेंटो, हेलीबर्टन और बैक्टेल के जमाने में यह बोलना देश की सबसे शक्तिशाली संस्थाओं के विचारधारा को उजागर कर देती है। कॉर्पोरेट प्रेस के साथ-साथ न्यायपालिका भी नवउदारवाद का हथियार बन गयी है। ऐसे माहौल में जबकि लोग खुद को इस अनवरत लोकतांत्रिक प्रक्रिया से थका हुआ महसूस कर रहे हैं, उन्हें केवल जलील किया जाता है, ऐसे में उनको क्या करना चाहिए? ऐसा नहीं है कि उनके पास हिंसा या अहिंसा का ही रास्ता बचा है। ऐसे राजनैतिक दल भी हैं, जो सशस्त्र संघर्ष में विश्वास तो करते हैं, लेकिन यह उनकी पूरी स्ट्रैटेजी का केवल एक हिस्सा है; इन संघर्षों में राजनैतिक कार्यकर्ताओं को बेरहमी से मारा-पीटा गया है और झूठे आरोप भी लगाए भी गये हैं, गिरफ्तार भी किया गया है। जनता इस बात को अच्छी तरह समझती है कि हथियार उठाने का मतलब क्या है; हिन्दुस्तान के राजकीय हिंसा के हजारों रूपों को अपने ही झेलना। छापामार सशस्त्र संघर्ष अगर रणनीति बन जाए तो आपकी दुनिया सिमट जाती है और सिर्फ दो ही रंग- स्वेत या श्याम दिखाई पड़ते हैं। लेकिन सभी विकल्प खत्म हो जाने पर हारकर जनता हथियार उठाने का निर्णय लेती है तब क्या हमें उसकी निंदा करनी चाहिए? क्या कोई विश्वास करेगा कि अगर नंदीग्राम के लोग धरना देते या गाना गाते तो पश्चिम बंगाल सरकार अपना निर्णय वापस ले लेती?
हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां निष्क्रिय रहने का मतलब निरंकुशता का समर्थन करना है (जो निश्चित रूप से हममें से कुछ लोगों को भाता भी है) और सक्रिय होने का मतलब भयानक कीमत चुकाना है और जो लोग इस कीमत को चुकाने के लिए तैयार हैं, उनकी आलोचना करना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल है।

आपने बहुत सारी यात्राएं की हैं-बहुत सारे संघर्षों को भी देखा है, क्या उनके बारे में कुछ बता सकती हैं? आप कौन से ऐसे स्थानों पर गई हैं? क्या इन स्थानों के कुछ संघर्षों के मुद्दों पर आप रोशनी डाल सकती हैं?
बहुत बड़ा प्रश्न है- क्या कहूँ? कश्मीर में सैनिक कब्जा, गुजरात में नव फ़ांसीवाद, छत्तीसगढ़ में गृह-युध्द, उड़ीसा में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा लूट, नर्मदा घाटी में सैकड़ों गांवों का डूबना, भुखमरी के कगार पर खड़े लोग, जंगलों का उजाड़ा जाना और भोपाल गैस त्रासदी के 24 वर्ष के आंदोलन से पीड़ितों को कुछ नहीं मिलने के बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार नंदीग्राम में यूनियन कार्बाइड (जिसे अब 'डॉव केमिकल्स' ने खरीद लिया है।) को दोबारा निमंत्रण दे रही है। मैं अभी हाल में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र तो नहीं गई हूं, लेकिन हम जानते हैं कि वहां लगभग एक लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। आंध्र प्रदेश में हुईं झूठी गिरफ्तारियों और भयानक दमन के बारे में हम जानते ही हैं। इनमें से हर स्थान का अपना विशिष्ट इतिहास, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण है। इनका विश्लेषण करना आसान नहीं है, फिर भी इन सबमें कुछ चीजें जैसे विशाल अंतरराष्ट्रीयता, सांस्कृतिक और आर्थिक दबाव के कारण एक जुड़ाव है। हिन्दुत्व प्रोजेक्ट की भी मैं बात करना चाहूंगी, जो हमारी नसों में अपना जहर फैला रहा है और एक बार फ़िर फटने का इंतजार कर रहा है। मैं कहूंगी कि इस सबके बाद भी विडम्बना तो यह है कि हम अब भी एक देश, एक संस्कृति और एक समाज हैं, जहाँ आज भी छुआछूत की प्रथा का प्रचलन है। जहां हमारे अर्थशास्त्री वृध्दि दर को लेकर डींग हांकते हैं, जबकि देश में अभी भी पेट पालने के लिए लाखों दलित प्रतिदिन दूसरे लोगों के मनों मैला अपने सिर पर ढोते हैं। दुनिया में कोई और ऐसा सुपरपावर है क्या?

हाल ही में बंगाल में हुई राज्य और पुलिस द्वारा हिंसा को कैसे देखा जा सकता है?
यह मामला किसी अन्य दूसरे राज्यों में हुई राज्य और पुलिस द्वारा हिंसा से अलग नहीं है- इसमें पाखंड और दोमुहें व्याख्यानों का मामला भी शामिल है, जिसमें मुख्यधारा के वामपंथी दल सहित अन्य सभी राजनैतिक पार्टियों की वाकपटुता शामिल है। क्या साम्यवादियों की गोलियां पूंजीवादियों से अलग हैं? अजीब- अजीब घटनाएं हो रही हैं। सउदी अरब में बर्फ़ पड़ रही है, तो कहीं दिन में उल्लू दिखाई दे रहे हैं। चीन सरकार निजी संपत्ति के अधिकार विधेयक को पारित करने के लिए बैठक कर रही है। मुझे नहीं पता कि क्या यह सब वातावरण परिवर्तन की वजह से हो रहा है! चीन के साम्यवादी इक्कीसवीं सदी के सबसे बड़े पूँजीवादी बन रहे हैं। तो फ़िर हम अपने संसदीय वामपंथियों से अलग उम्मीद क्यों करें? नंदीग्राम और सिंगूर इस बात के स्पष्ट संकेत हैं।
यह सोचने की बात है कि क्या हर क्रांति का अंत आधुनिक-पूँजीवाद होता है? जरा सोचिए, आपको आश्चर्य होगा-फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति, चीनी क्रान्ति, वियतनाम युध्द, रंगभेद विरोधी संघर्ष और भारत में स्वतंत्रता के लिए कथित गाँधीवादी संघर्ष! इन सबका अंजाम क्या हुआ? क्या यह कल्पना का अंत है?

बीजापुर में माओवादी हमला- जिसमें पचपन पुलिस कर्मियों की मौत हुई थी। क्या यह विद्रोह राजकीय हिंसा का ही दूसरा चेहरा तो नहीं है?
कैसे यह कहा जा सकता है कि यह हमला राजकीय हिंसा का दूसरा चेहरा है? क्या कोई यह कहेगा कि जो लोग रंगभेद के खिलाफ़ लड़े, चाहे उनके तरीके कैसे भी रहे हों, वह भी राजकीय हिंसा का दूसरा रूप था? जो अल्जीरिया में फ्रांसीसियों से लड़े उनके बारे में आप क्या कहेंगे? या जो नाजियों से लड़े, जो उपनिवेशवादी ताकतों से लड़े, या वे जो इराक में अमेरिकी कब्जे के खिलाफ़ लड़ रहे हैं, क्या यह सब भी राजकीय हिंसा का दूसरा रूप है? इससे आधुनिक मानव अधिकार वाली रिपोर्ट की भाषा का प्रयोग कर हम राजनीतिक बन जाते हैं, जिससे असली राजनीति बह जाती है। जितना भी हम धर्मात्मा बनने की कोशिश करें, जितना भी हम अपनी जटा में भभूत लगाएं, हमारे पास कोई विकल्प नहीं रह गया है। लेकिन दु:खद तो यह है कि हम हिंसा के माहौल में खुद को साफ-सुथरा नहीं रख सकते, हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है। छत्तीसगढ़ में गृहयुध्द चल रहा है, जिसे राज्य सरकार चला रही है और सार्वजनिक रूप से बुश सिध्दांत का पालन कर रही है- 'अगर तुम हमारे साथ नहीं हो तो तुम आतंकवादियों के साथ हो।' इस जंग में औपचारिक सुरक्षा बलों के साथ-साथ सलवा-जुडूम भी एक प्रमुख हथियार है, जो नागरिक सेना का सरकारी समर्थन प्राप्त सशस्त्र सैनिक है, जो 'स्पेशल पुलिस आफ़िसर' (एसपीओ) बनने को मजबूर हो गया है। सरकारों ने कश्मीर, मणिपुर, नागालैंड में भी यही कोशिश की है। हजारों लोग मारे गए हैं। लाखों लोगों को सताया गया है, हजारों लोग लापता हो गए हैं। कोई 'बनाना रिपब्लिक' ही ऐसी चीजों पर गर्व कर सकती हैं....... और अब सरकार इन नकारा तरीकों को हर जगह पर लागू करना चाहती है। हजारों आदिवासी अपनी खनिज प्रधान जमीनों को पुलिस छावनी में बदलने पर मजबूर हो गए हैं। सैकड़ों गाँवों को जबरदस्ती खाली करा दिया गया है। जिन जमीनों में लौह-अयस्क बहुतायत में है, वहां टाटा और एस्सार जैसी कंपनियों की गिध्द-दृष्टि लगी हुई है। जमीन देने के समझौता-पत्रों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं लेकिन कोई नहीं जानता कि उनमें क्या कहा गया है, पर भूमि अधिग्रहण शुरू हो गया है। इसी तरह की घटनाएं दुनिया के सबसे ज्यादा उजड़े हुए देशों में से एक कोलंबिया में हो रही हैं, जब सबकी आखें सरकारी समर्थन प्राप्त नागरिक सैनिकों और गुरिल्ला सैनिकों के बीच बढ़ती हुई हिंसा पर लगी है, तो ऐसे समय में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां चुपचाप खनिज सम्पदा लूटने में लगी हुई हैं। रंगमंच की ऐसी ही छोटी सी 'स्क्रिप्ट' छत्तीसगढ़ में लिखी जा रही है।
वास्तव में यह दुख की बात है कि 55 पुलिसकर्मी मारे गए; लेकिन वे भी दूसरों की तरह सरकारी नीति के ही शिकार हैं। सरकार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए तो मात्र वे एक तोप के गोले के तरह हैं- पुलिसकर्मी तो सत्ता के हथियार मात्र हैं, कुछ मर गये तो सरकारे और भर्ती कर लेंगी। ऐसी मौतों पर मगरमच्छ के ऑंसू बहाए जाएंगे, कुछ समय के लिए टीवी एंकर हमें भी फड़फड़ा देते हैं। होगा क्या? और पुलिसकर्मी आ जाएंगे। जहां तक माओवादियों की बात है- तो उन्होंने जिन पुलिस और 'पुलिस के विशेष अधिकारियों' (एसपीओ) व सरकारी अधिकारियों को मारा; वे सब दमन, यातनाओं, हत्याओं और झूठे मुठभेड़ों के आरोपी थे; गांवों को जलाना और स्त्रियों के साथ बलात्कार करना उनके व्यवसायिक कर्तव्यों में था। चाहे कितना ही दूर तक सोच लीजिए- अगर वे वास्तव में ऐसे हैं- तो वे निर्दोष नागरिक नहीं हैं।
मुझे इनमें कोई संदेह नहीं कि माओवादी आतंक और दमन के एजेंट हैं। मुझे इसमें भी कोई शक नहीं कि उन्होंने भी बेरहमी की होंगी। बेशक वे इस बात का भी दावा नहीं कर सकते कि स्थानीय लोग बिना किसी प्रतिरोध के उनका समर्थन कर रहे हैं- लेकिन यह दावा कौन कर सकता है? फ़िर भी कोई गुरिल्ला सेना बिना स्थानीय समर्थन के टिक भी तो नहीं सकती। यह तार्किक रूप से भी असम्भव है और माओवादियों का समर्थन कम नहीं हुआ है, बल्कि बढ़ रहा है। जनता के पास कोई विकल्प नहीं है सिवाय इसके कि वह जिसको कम बुरा समझती है, उसकी ओर हो जाती है। पर यह कहना कि नाइंसाफी के खिलाफ जो लड़ रहे हैं और जो नाइंसाफी सरकार कर रही है दोनों एक जैसे हैं, अजीब सी बात है। सरकार ने अहिंसक प्रतिरोध के लिए सभी दरवाजे बंद कर लिये हैं। इस पर जब लोग हथियार उठाते हैं, तो हर प्रकार की हिंसा होने लगती है- क्रांतिकारी, लम्पट और पूरी तरह अपराधी। इससे उत्पन्न हुई भयानक परिस्थितियों के लिए सरकार खुद उत्तरदायी है।

'नक्सली', 'माओवादी' और 'बाहरी लोग' इस तरह के शब्द आजकल बहुत ज्यादा इस्तेमाल किए जा रहे हैं। क्या आप इन्हें परिभाषित कर सकती हैं?
'बाहरी ताकतें' इस तरह का दोषारोपण दमन की प्रारंभिक अवस्था में किसी भी सरकार द्वारा किया जाना स्वाभाविक है। किसी भी घटना के लिए सरकारें सहजता से सारा दोष बाहरी ताकतों के सिर मढ़ देती हैं और अपने ही प्रचार पर विश्वास करने लगती हैं और सरकारें शायद इस बात का अनुमान भी नहीं लगा पातीं कि जनता उसके विरोध में खड़ी हो गई है। यही सब बंगाल में माकपा कर रही है। हालांकि कुछ लोग कहेंगे कि बंगाल में यह दमन नया नहीं है। बस अब केवल बढ़ गया है- फिर भी ये 'बाहरी ताकतें' कौन हैं? सीमाओं का निर्धारण कौन करता है? क्या वे गाँव की सीमाएं हैं? तहसील? ब्लाक? जिला या राज्य की सीमाएं हैं? क्या संकीर्ण क्षेत्रीय और धार्मिक राजनीति साम्यवादियों का नया मंत्र है? रही नक्सली और माओवादियों की बात- भारत पुलिस राज्य बनता जा रहा है, जिसमें जो भी व्यवस्था का समर्थन नहीं करेगा, उसे आतंकवादी करार दिए जाने का खतरा उठाना पड़ेगा। मुस्लिम आतंकवादी को मुस्लिम होना जरूरी है- आदि जैसे वर्गीकरण से बचने के लिए उन्हें एक ऐसा नाम चाहिए था, जो सभी को परिभाषित कर दे। इसलिए परिभाषाओं को छोड़ दें, बिना परिभाषा के ही ठीक हैं। क्योंकि वह समय दूर नहीं जब हम सभी को माओवादी या नक्सलवादी, आतंकवादी या आतंकवादियों का समर्थक कहा जाएगा और फिर जेलों में बंद कर दिया जाएगा, उन लोगों के द्वारा जो वास्तव में या तो जानते नहीं हैं या इस बात की परवाह नहीं करते हैं कि माओवादी या नक्सली कौन हैं। गांवों में यह कार्यक्रम शुरु हो गया है और हजारों लोगों को जेलों में डाला जा रहा है। उन्हें राज्य को समाप्त करने की कोशिश करने वाले आतंकवादी करार दिया गया है। असली नक्सली और माओवादी कौन हैं? मैं इस विषय की विशेषज्ञ तो नहीं हूँ, लेकिन इनका एक मौलिक इतिहास है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन 1925 में हुआ था और 1964 में इसका विभाजन हुआ और माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी -माकपा इससे अलग हो गई और एक अलग पार्टी बना ली। दोनों ही संसदीय राजनैतिक दल थे। 1967 में माकपा ने कांग्रेस से अलग हुए एक ग्रुप के साथ पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल की। उस समय देहात के भूखों मर रहे किसानों में काफ़ी रोष था। माकपा के स्थानीय नेता कानू सान्याल और चारू मजूमदार ने नक्सलबाड़ी जिले में किसानों को संगठित किया और यहीं से नक्सली शब्द की शुरूआत हुई। 1969 में सरकार गिर गई और सिध्दार्थ शंकर रे के नेतृत्व में कांग्रेस के हाथ में पुन: सत्ता आ गई। नक्सलियों को निर्दयता से कुचला गया। इस समय के बारे में महाश्वेता देवी ने लिखा भी है। 1969 में माकपा से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (लेनिनवादी-माक्र्सवादी)-'सीपीआई (एमएल)' अलग हो गए। कुछ सालों के बाद 1971 के आसपास सीपीआई(एमएल) कुछ दलों में बँट गई। जैसे बिहार में सीपीआई-एमएल(लिबरेशन), सीपीआई- एमएल(न्यू डिमोक्रसी) जो आंध्र प्रदेश और बिहार के कई हिस्सों में काम कर रही है और सीपीआई-एमएल (वर्गसंघर्ष) जो मुख्य रूप से बंगाल में सक्रिय है। इन दलों को ही नक्सली कहा जाता है। वे अपने को माओवादी नहीं, बल्कि लेनिनवादी मार्क्‍सवादी के रूप में देखते हैं। वे चुनावों, जनकार्यवाही और हमला होने की स्थिति में सशस्त्र संघर्ष में भी विश्वास करते हैं। बिहार में कार्यरत एमसीसी(माओईस्ट कम्युनिस्ट सेंटर) का गठन 1968 में हुआ था। आंध्र प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में क्रियाशील पीडब्लूजी(पीपुल्स वार ग्रुप) 1980 में बनी थी और एमसीसी और पीडब्लूजी ने 2004 में ही मिलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(माओवादी) का गठन किया है। वे राज्य को समाप्त करने और पूर्ण युध्द में विश्वास करते हैं। वे चुनाव में भाग नहीं लेते। यही वह दल हैं, जो बिहार, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में गुरिल्ला युध्द कर रहे हैं।

भारत सरकार और मीडिया माओवादियों को 'आंतरिक सुरक्षा' के लिए बड़े खतरे के रूप में देखते हैं। क्या उन्हें इसी रूप में देखा जाना चाहिए?
मुझे यकीन है कि माओवादी इस परिभाषा से काफी खुश होंगे।

माओवादी व्यवस्था बदलने के मकसद से लड़ रहे हैं। वे माओ की तानाशाही विचारधारा से प्रेरणा लेते हैं। वे क्या विकल्प तय करेंगे? क्या उनके शासन में शोषणकारी निरंकुश हिंसा नहीं होगी? क्या वे पहले से ही आम आदमी का शोषण नहीं कर रहे हैं? क्या वास्तव में उन्हें आम आदमी का समर्थन मिल रहा है?
मुझे लगता है कि हमारे लिए यह बताना जरूरी है कि माओ और स्टालिन दोनों ही हत्याओं के इतिहास के साथ संदिग्ध हीरो हैं। उनके शासन में करोड़ों लोग मारे गए थे। चीन और सोवियत संघ में जो कुछ हुआ, उसके अलावा पोलपोट ने चीनी साम्यवादी दल के समर्थन से कम्बोडिया में दो लाख लोगों को खत्म कर दिया था (इस दौरान पश्चिमी देशों ने जानबूझकर चुप्पी साध रखी थी) और लाखों लोगों को बीमारी और भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था। क्या हम चीन में हुई सांस्कृतिक क्रान्ति की हिंसा से मुंह मोड़ सकते हैं? या इस बात को नकार सकते हैं कि सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में लाखों लोग लेबर कैंपों और टार्चर-चैम्बरों, जासूसों और गुप्तचरों व पुलिस के शिकार नहीं हुए थे? इनका इतिहास भी पश्चिमी साम्राज्यवाद के इतिहास की तरह अंधकारमय ही है। बस केवल इतना फर्क है कि इसका जीवनकाल बहुत छोटा था। अगर हम तिब्बत और चेचन्या के मुद्दे पर मौन रहते हैं तो हम इराक, फिलीस्तीन और कश्मीर में हो रही कार्यवाहियों की आलोचना भी नहीं कर सकते। मैं यह उम्मीद करूंगी कि माओवादी, नक्सली और मुख्य वामपंथी अपने इतिहास से सीख लेते हुए अपने इतिहास को दोबारा नहीं दोहराएंगे और भविष्य में जन-विश्वास को कायम रखेंगे। क्योंकि लोग यही उम्मीद करते हैं कि इतिहास दोहराया नहीं जाएगा। लेकिन वे इससे पलटते हैं तो जनता का विश्वास नहीं जीत सकते............फिर भी नेपाल के माओवादियों ने नेपाल के राजतंत्र के खिलाफ़ बहादुरी और सफ़लतापूर्वक संघर्ष किया है और अब भारत में भी माओवादी और विभिन्न लेनिनवादी-माक्र्सवादी दल अन्याय के खिलाफ़ लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं। वे न केवल राज्य बल्कि सामंती जमींदारों और उनके सशस्त्र सैनिकों के खिलाफ़ भी संघर्ष कर रहे हैं। लड़ने वालों में वे आज अकेले ही हैं और इसके लिए मैं उनकी प्रशंसा करती हूँ। ऐसा हो सकता है, जैसा आपने कहा कि जब उनके हाथ में सत्ता आए तो वे क्रूर, अन्यायी और निरंकुश और शायद वर्तमान सरकार से भी बुरे साबित हों। हो सकता है, लेकिन मैं इस सब के बारे में पूर्वधारणा बनाने के लिए तैयार नहीं हूं। अगर वे ऐसे बनते हैं तो हमें उनके खिलाफ़ भी लड़ना होगा और उसके लिए पहला व्यक्ति कोई मेरे जैसा ही होगा। लेकिन अभी तो यह समझना महत्वपूर्ण है कि वे प्रतिरोध के मोर्चे पर सबसे आगे खड़े हैं। हममें से कई लोग, उन लोगों के साथ हो लेते हैं, जहां हमें पता है कि यहाँ धार्मिक या वैचारिक रूप से हमारी कोई जगह नहीं है। यह सच है कि सत्ता मिलते ही प्रत्येक स्वाभाविक रूप से बदल जाता है। मंडेला के अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस को ही देख लीजिए- भ्रष्ट, पूंजीवादी, आईएमएफ के आगे सिर झुकाने वाली, गरीबों को उनके घर से बेघर करने वाली, लाखों इन्डोनेशियाई साम्यवादियों की हत्या करने वाले सुहार्तो का सम्मान करने वाली (जिसे दक्षिण अफ्रीका के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से नवाजा गया था)। किसने सोचा था कि ऐसा होगा, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि दक्षिण अफ्रीक़ा को रंगभेद के खिलाफ़ संघर्ष को रोक देना चाहिए था? या फिर इसके लिए उन्हें अब पछताना चाहिए? क्या इसका मतलब यह है कि अल्जीरिया को फ्रांसीसी उपनिवेश में बने रहना चाहिए? क्या कश्मीरियों, फिलिस्तीनियों और इराकियों को सैनिक कब्जा को स्वीकार कर लेना चाहिए? जिन लोगों की गरिमा को चोट पहुंची है, क्या उन्हें लड़ाई छोड़ देनी चाहिए? इसलिए कि उन्हें जंग में नेतृत्व करने वाला कोई संत-महात्मा नहीं मिला।

क्या हमारे समाज में आपसी संवाद की भाषा खत्म हो गयी है?
बिल्कुल।
यह साक्षात्‍कार पीपुल्‍स न्‍यूज नेटवर्क पर प्रकाशित हो चुका है।