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Monday, February 16, 2009

चलना तलवार की धार पर

कक्षा की वह मौन जमात कोई साधारणीकरण नहीं है। इसमें जिन तीन स्‍तरों की चर्चा है वह रूढ़ नहीं हैं। कक्षा में आंतरिक गतिशीलता भी बनी रहती है। यानी शुरू में जो वाचाल दिख रहा है वह धीरे-धीरे बीच की कतार या फिर मौन जमात में शामिल हो सकता है। इसी तरह मौन जमात में शामिल सदस्‍य अगली पंक्ति में आ जाते हैं। दरअसल, यह तीन कतारें आम प्रवृत्ति को दर्शाती हैं।
सत्र शुरू होते ही अपना सिक्‍का जमाने की होड़ शुरू हो जाती है। परिचय सत्र आम तौर पर चमकदार होता भी है। लेकिन धीरे धीरे सभी अपनी जगहें तय कर लेते हैं। ऐसे ही एक विद्यार्थी की ताजा स्‍मृत‍ि है। वह अत्‍यंत मेधावी था। शुरुआती कक्षाओं में उसकी गतिशीलता, विचारों की स्‍पष्‍टता दिखी भी लेकिन अचानक उसे लगने लगा कि बाकी लोग उससे बेहतर हैं। उसे तो अभी बहुत कुछ सीखना है। धीरे-धीरे वह निष्‍क्रय होता गया। उससे उम्‍मीद थी की कक्षा की बहसों में, विभिन्‍न प्रक्रियाओं में उसकी उपस्थिति से नई जान आएगी, लेकिन उसने किनारा कर लिया। आखिरकार जब सत्र समाप्त होने आया, तब उसका आत्‍मविश्‍वास लौटा। ध्‍यान दिया जाए तो ऐसे बहुत से उदाहरण मिल सकते हैं जो कक्षा की अंदरुनी गतिशीलता बयान करते हों।
कक्षा की गतिशीलताओं में शिक्षक की भूमिका होती है। वह उत्‍प्रेरक भी हो सकता है और घातक भी । अपेक्षा तो उससे उत्‍प्रेरक की ही जाती है। संभव है कुछ प्रयासों का असर सकारात्‍मक दिखे भी और यह भी संभव है कि प्रतिक्रियाओं से बनी बातें बिगड़ जाएं। कक्षा को साथ लेकर चलने के तरीके में वाचाल लोगों को चुप कराना पड़ सकता है, ताकि औरों को मौका मिल सके। इस कदम के निहितार्थ को न समझा जाए तो उलटा असर हो सकता है। विद्यार्थी ऐसा सोच सकते हैं कि उनका दमन किया जा रहा है, अवसर छीने जा रहे हैं।
आम तौर पर इतनी बारीक बातें सोची नहीं जातीं और न ही इनकी परवाह की जाती है। समझो तो ठीक ना समझो तो ठीक का चलताउ तरीका व्‍यवहार में है। पैंतालिस मिनट या एक घंटा बोल कर कागज समेट लेना बहुत आसान तरीका है। दूसरा तरीका तलवार की धार पर चलना है। वह पूरी तरह प्रक्रिया में शामिल होने की मांग करता है। ऐसा सोचते हुए राष्‍ट्रीय राजमार्गों के किनारे लगे होर्डिंग की याद आ रही है - सावधानी हटी कि दुर्घटना घटी।

Wednesday, February 11, 2009

कक्षा की वह मौन जमात

कक्षा की अपनी गतिकी होती है। इसमें कक्षा में उपस्थित विद्यार्थियों की पृष्‍ठभूमि, उनके आपसी रिश्‍ते , शिक्षक से उनके संबंध आदि महत्वपूर्ण कारक होते हैं। यहां हम कुछ सामान्य प्रवृत्तियों पर चर्चा करेंगे जो प्राइमरी से पीजी तक हर जगह दिखायी देती है। हर कक्षा में पांच से दस फीसदी चमकती प्रतिभा वाले या मुखर विद्यार्थी होते हैं। वे शिक्षक की हर गतिविधि पर न केवल प्रतिक्रिया देते हैं बल्कि सारी गतिविधि अपने आस-पास सीमित कर लेना चाहते हैं। कहा जा सकता है कि अपने बीच ही शिक्षक को अटकाए रखते हैं। कालक्रम में उनकी गतिशीलता कक्षा पर इस कदर हावी होती है कि वे ड्राइविंग सीट पर होते हैं जहां चाहते हैं वहां कक्षा को ले जाते हैं।
लेकिन इनके ठीक पीछे दूसरा समूह होता है। जो मुखर तो नहीं होता लेकिन इस तरह से मुखर विद्यार्थियों के छा जाने से आक्रोश में रहता है। सीधे तो नहीं लेकिन गाहे बगाहे ऐसे मौके की ताक में रहता है जब अपनी शिकायत दर्ज करायी जा सके। कभी-कभार वह सक्रिय हो भी जाता है लेकिन इसमें कोई निरंतरता नहीं रहती। बल्कि उसे अपनी सक्रियता पर पूरा भरोसा नहीं होता। उनको यह भी लगता रहता है कि बाजी हाथ से जा चुकी है ऐसा करके भी वे ड्राइविंग सीट पर नहीं आ सकते।
सबसे बड़ी वह संख्या होती है जो एकदम ही निस्प्रीह होती है। कक्षा में अगर हां हो रही है तो हां और ना हो रही है तो ना की पक्षधर। वह इन तमाम गतिविधियों लेन-देन के क्यों में नहीं पड़ना चाहती। जो भी हो रहा है ठीक ही हो रहा होगा। इस श्रेणी को खुद पर बिल्कुल ही भरोसा नहीं होता, भय यह होता है कि अगर हां या ना के पक्ष में अधिक मुखर हुए तो कारण बताना पड़ सकता है और ऐसा मौका अपमानजनक होगा। जो सही या गलत है धीरे-धीरे उसका पता तो चल ही जाएगा।
सबसे अधिक घाटा कक्षा के इस मौन संप्रदाय को ही उठाना पड़ता है। शिक्षाविद ऐसा बताते हैं कि एक शिक्षक के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस संप्रदाय की तत्काल पहचान कर लेने की होती है। और आदर्श यही है कि कक्षा की प्रगति का मानदंड इस पंक्ति में हो रहे विकास को बनाया जाए। सफल शिक्षकों की कहानी के स्रोत इसी कतार में ढूंढे जा सकते हैं।

Wednesday, November 26, 2008

कक्षा के स्‍थाई भाव

हरेक इलाके के कुछ स्‍थाई भाव होते हैं जो माकूल समय पाकर प्रकट होते रहते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ इसी तरह के भाव हैं जैसे गुरु गोविंद ....। अब गुरु अंधकार से प्रकाश की ओर ले जा रहा है या प्रकाश पर परदा डाल रहा है इसका मूल्‍यांकन समय के साथ होता रहता है लेकिन वह सामने पड़ जाए तो पूर्वोक्‍त दोहा जरूर दुहराया जाता है। शिक्षक दिवस पर तो उसके बिना भाषण ही नहीं शुरू होता।
कुछ वर्ष पहले एक छात्र ने ऐसे ही एक दिवस पर गुरु और शिक्षक को अलगाकर देखने की बात कही थी। उसने बड़ी रोचक परिभाषा दी जीवन के दो स्‍तर हैं एक शरीर और दूसरा आत्‍मा... उसकी व्‍याख्‍या तनिक लंबी थी, निष्‍कर्ष यह था कि जो शरीर पालने की विद्या सिखाता है वह शिक्षक है और जो आत्मिक उन्‍नति अर्थात आध्‍यात्मिक विकास की राह दिखाता है वह गुरु है। अन्‍यार्थ न हो इसलिए उसने अंत में यह जरूर जोड़ दिया कि शरीर के बिना आत्‍मा की कल्‍पना नहीं की जा सकती इसलिए यह संसारी शिक्षक भी गुरु तुल्‍य है।
शिक्षक और गुरू अथवा शिक्षक या गुरू की इस तरह की कई सनातन छवियां हैं तो ताजा समय से बेमेल होने लगी हैं। एक धारणा यह भी है कि विद्या गुरू कि जबान पर होती है। यानी वह विद्याओं को इतना घोंट चुका होता है कि उन पर चर्चा करते वक्‍त किसी सहायक सामग्री की आवश्‍यकता नहीं पड़ती। बस आप विषय का नाम लीजिये और गुरुजी शुरू। हालांकि ऐसी महान विभूतियों का धरती पर अकाल नहीं पड़ा है लेकिन छात्रों से संवाद के तरीके और तकनीक में समय के साथ बदलाव भी आया है।
कक्षा का स्‍वरूप बदलने लगा है चॉक और बोर्ड की जगह ओवरहेड प्रोजेक्‍टर और अन्‍य कंप्‍यूटर सहायक संसाधनों का जमाना है ऐसे में गुरु की ईश्‍वरीय छवि संकट में आ गयी लगती है। क्‍योंकि वह इस नश्‍वर संसार से सहायक सामग्री का इस्‍तेमाल करने लगा है। इस दोष ने उसे ईश्‍वर की अपेक्षा अपने बीच का सामान्‍य आदमी बना दिया है। यह बात दीगर है कि आधुनिक शिक्षा शास्‍त्र उससे ऐसा ही होने की उम्‍मीद करता है ताकि छात्र उससे संवाद कर सकें। लेकिन उन स्‍थाई भावों और सनातन छवियों का क्‍या करें जो अपनी जमीन छोड़ने को ही तैयार नहीं हैं ...

Saturday, December 1, 2007

तीर घाट मीर घाट

भाईसाब संस्‍थान से बाहर निकले तो आज चेहरा उतरा हुआ था। मैंने टोका नहीं। अपने अनुभ्‍ाव शेयर करने लगा ...बच्‍चों को कोई काम करने के आने को कहो तो पता नहीं किस काम में व्‍यस्‍त रहते हैं, कर ही नहीं पाते। ऐसा लगता है कि अपने यहां कक्षा में पढ़कर आने की आदत नहीं है। दूसरी जगहों पर, आशय विकसित देशों से है, कक्षा के पहले रीडिंग मैटीरियल दिया जाता है। छात्र उसको पढ़कर आते हैं, प्रस्‍तुति करते हैं, फिर सवाल जवाब होते हैं। लेकिन यहां देखो तो बच्‍चे बस टुकुर टुकुर ताकते रहते हैं,सवाल भी आप ही रखो और जवाब भी आप ही दो। दरअसल पढ़ाने का यह ढांचा बदलना चाहिए। ऐसा लगता है...
... भाई साब हां हूं कर रहे थे। मुझे लगा या तो वह उंघ रहे हैं या फिर किसी और चिंता में हैं। टोका कि सुन रहे हैं न..
.... बोलते रहो, मैं सुन रहा हूं और कुछ सोच भी रहा हूं - वे बोलने लगे थे।
दरअसल, मुझे भी यह बात बहुत दिन से सता रही है कि बच्‍चे ऐसे क्‍यों हैं। उनका क्‍लास में मन क्‍यों नही लगता। क्‍यों वे क्‍लास के समय भी इधर-उधर आते जाते दिख जाते हैं। क्‍या यह किसी खास शिक्षक की कक्षा में ही होता है या यह एक आम पैटर्न है। काम करके आने में उन्‍हें क्‍यों परेशानी है। क्‍या वह बात नहीं समझ पा रहे या फिर काम को टाल रहे हैं। ऐसी टालू वृत्‍त‍ि क्‍यों है....
कई बार उनके चेहरे को देख कर लगता है कि वे कहीं अंटके हुए हैं किसी तरह के बोझ में दबे हुए हैं। जो चाहते हैं वह कह नहीं पार रहे अथवा सामने वाले के गुजर जाने का इंतजार कर रहे हैं। अगर वह अपने शिक्षकों के समक्ष सवाल नहीं रख सकते, अपनी परेशानियों पर बात नहीं कर सकते तो फिर कहां बात करेंगे। क्‍या शिक्षक समचुच इस काब‍िल नहीं रहे‍ कि उनसे सहज होकर अपनी बात कही जा सके। क्‍या हमारे हाव-भाव में एक दूरी बरतने या उनकी अपेक्षाओं को इनकार करने की बात झलक रही है। क्‍या वे सचमुच शिक्षकों से असहज महसूस कर रहे हैं या इसका दिखावा कर रहे हैं। ......या उन्‍हें बस कुछ बना बनाया उत्‍तर चाहिए...रेडीमेड...कोई अचूक फारमूला... बौद्धिक कंज्‍युमर होते जा रहे हैं...
भाइसाब लगातार बोलते जा रहे थे। उनके सरोकार समझ में आ रहे थे और समस्‍याएं भी। लेकिन इसके लिए कोई बना बनाया उत्‍तर नहीं था। हम इस पर बातचीत कर सकते थे। बातचीत के जरिए उन छात्रों की वास्‍तविक कठिनाइयों को जान सकते थे । लेकिन क्‍या यह जानना एकतरफा जानना नहीं होगा । इसमें असली भागीदार तो छात्र ही हैं, उनके शामिल हुए बगैर किसी हल या समझ का कोई अर्थ नहीं होगा। कभी कभी किसी बात पर हमारे तार मिलते हैं और फिर बात कहीं और निकल जाती है मानों हम दो छोर पर बैठे हों - एक तीर घाट एक मीर घाट।
दिल्‍ली की ट्रैफिक और शोर शाराबे में हमारे बीच ये बातें देर तक उमड़ती घुमड़ती रहीं।

Wednesday, September 12, 2007

क्‍लास रूम 4

अपने यहां स्‍कूल से ही पढ़ाई का ऐसा सिलसिला शुरू होता है कि पढ़नेवाला/वाली किताब से बंधकर रह जाता है। चौतरफा कोशिश चलती रहती है कि आपको घेर बांध कर किताबों के भीतर प्रवेश दिला दिया जाए। आंख पोछते कंधे पर बस्‍ता बांधे जबरन स्‍कूल की चारदिवारी में धकेले जाते बच्‍चे देश के हर कोने का आम दृश्‍य है। वह तो भला हो संचिन तेंदुलकर, गीत सेठी, विश्‍वनाथन आनंद, पीटी उषा जैसी प्रतिभाओं का जिनने बरसों से जड़ हो गई कहावत - पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब खेलोगे कूदोगे ----- को चुनौती दी। ऐसे लोगों ने यह बताया कि दुनिया और भी है। जीने और सीखने के रास्‍ते और भी हैं।
लेकिन यहां पर खेल बनाम शिक्षा की बात नहीं करनी है। किताबों से बंधे रहने का सिलसिला जो स्‍कूलों में शुरू होता है वह स्‍कूल, कॉलेज होता हुआ अन्‍य पेशेवर पढ़ाइयों में भी अपना रंग दिखाता रहता है। ऐसे सौभाग्‍यशाली विद्यार्थी कम ही मिलेंगे जिन्‍हें साक्षरता की बजाए शिक्षा और रटने की जगह समझने को ओर प्रवृत किया गया हो। शायद हमने जो शिक्षा का ढांचा विकसित किया है उसका फोकस भी इस पर नहीं है। उत्‍तरप्रदेश और खासकर बिहार में तो पिछले कुछ वर्षों में स्‍कूलों की यह हालत रही है कि हजार विद्यार्थियों पर चार या पांच शिक्षक ही उपलब्‍ध रहे हैं। इसके अपवाद हो सकते हैं, लेकिन शिक्षक और छात्रों का अनुपात अत्‍यंत ही चिंताजनक रहा है। ऐसे में कोई शिक्षक किसी को क्‍या समझाएगा और कौन से कौशल विकसित कर पाएगा।
उत्‍साह में या फिर आलोचना में यह जरूर कहा जा सकता है कि शिक्षक चाहे तो क्‍या नहीं कर सकता है। लेकिन हर शिक्षक -क्‍या नहीं कर सकता - वाली मिट्टी का ही बना हो ऐसा मानकर नहीं चला जा सकता। अगर ऐसा हो पाता तो कोई बात ही नहीं थी। लिहाजा बच्‍चों को प्राइवेट ट्यूशन, कोचिंग क्‍लासेस, गेस पेपर, चुनिंदा प्रश्‍न आदि के मकड़जाल में फंसना पड़ता है। इस मकड़जाल में एक ही उपाय काम करता है ज्ञान की सुई लगा दो। यह सुई किस मरीज पर कितना और कैसा असर करती है इसकी परवाह करने कोशिश यह तंत्र न तो करता है न ही करना चाहता है। और यह सब इसलिए होता है क्‍योंकि पूरा तंत्र परीक्षा केन्द्रित है। लिहाजा पूरी शिक्षा व्‍यवस्‍था एक अदद छापेखाने में तब्दिल होकर रह जाती है। जिसमें से हर साल मैट्रिक, इंटर, बीए, एमए और पीएचडी तक के फर्मे में भारी उत्‍पादन हो रहा है।
इसमें थोड़ी अतिरंजना लग सकती है लेकिन क्‍लास में आते ही विद्यार्थी प्रश्‍न कैसे लिखे जाएं, नोट्स कैसे बनाएं जाएं, की चिंता में लग जाएं तो इससे यही अर्थ निकलता है कि हमारी शिक्षा और यहां पर विशेष रूप से कहना होगा कि विश्‍वविद्यालयी शिक्षा में किस तरह का घून लगा हुआ है। परीक्षा परीक्षा .. परीक्षा । विद्यार्थी में अगर स्‍वत: सीखने और करते हुए सीखने का दीया नहीं जला है और परिसर के अलावा बाकी सजीव दुनिया से समाज से विद्यार्थी रिश्‍ता नहीं बना पाता तो आपको क्‍या लगता है चंद टेक्‍स्‍ट बुक, टृयूटोरियल और रियाज से कोई अच्‍छा पत्रकार बन सकता है। समस्‍या इन बच्‍चों में नहीं है, उस तंत्र में है जिसने इनकी प्रतिभा को अजीब तरह के खांचे में बंद सा कर दिया है जो परीक्षा और प्रश्‍नपत्र के अलावा कहीं देखता ही नहीं । इस ढांचे को तोड़ना एक बड़ी चुनौती है।

Thursday, August 23, 2007

क्‍लास रूम 3

नवाचारी शिक्षा में अब इस बात पर जोर दिया जाता है कि कक्षाओं की बनावट आयताकार नहीं रहनी चाहिए। हम सभी जानते हैं और बचपन से ऐसा ही देखा है कि कक्षाएं आयाताकार होती हैं और एक के पीछे एक कईं पात बनाकर लड़के लड़कियां बैठते हैं। महानगरों के अनुभव को छोड़ दें तो बाकी अधिकांश जगहों पर लड़कियों की पांत अलग ही होती है। महानगर पूर्णत: इस श्रेणीक्रमवाली कक्षा से मुक्‍त हैं और गांव मे हर जगह बिल्‍कुल समस्‍या ही है, यहां इस तरह के साधारणीकरण का ऐसा कोई इरादा नहीं है।
सत्र शुरू होने के एकाध दिन के बाद हर कक्षा में सबकी जगह तय हो जाती है कि कौन कहां बैठेगा। कई बार इतनी ज्‍यादा तय हो जाती है कि उसपर जूतमपैजार तक हो जाती है। जिन बच्‍चों की उंचाई कम है, जो कम सुनते हैं या जिन्‍हें दूर से दिखाई नहीं देता, ऐसी किसी भी समस्‍या के प्रति इन कक्षाओं में कोई संवेदनशीलता नहीं होती। हम सभी जानते हैं कि गांव की पृष्‍ठभूमि में हर गांव में मिडिल, हाईस्‍कूल या कॉलिज नहीं होता। ऐसे में एक मोहल्‍ले के बच्‍चों को किसी और मोहल्‍ला या फिर एक गांव या कस्‍बे में पढ़ाई के लिए जाना ही पड़ता है। ऐसे में अक्‍सर मोहल्‍ला, गांव, जाति के आधार पर पांत बनने लगती है। जाहिर है इस संदर्भ में स्‍थानीय बच्‍चों की तूती बोलती है।
मेरी कक्षा में भी पहले दिन कुछ उसी तरह की पांत बन गई। लड़कियां साफ दिख जाती हैं इसलिए पहला विभाजन यही था। पत्रकारिता करने के आकांक्षी लोगों को इस तरह बैठे देखकर यही लगा कि ऐसे रुढि़बद्ध लोग कहां जायेंगे। पहली बहस यहीं शुरू हुई। बहस का नतीजा सकारात्‍मक रहा और अब यह पांत नहीं रही । लेकिन दूसरे बंटवारे अब नहीं हैं ऐसा नहीं कहा जा सकता ।
कक्षा में सभी विद्यार्थी शिक्षक से समान दूरी पर रहें, सब पर बराबर नजर हो, सबतक बराबर आवाज पहुंचे, सभी बराबरी से अपनी बात कह पाएं, शायद कक्षा का गोलाकार या अर्द्धवृताकार ढांचा इसमें मददगार हो सकेगा।

Sunday, August 19, 2007

क्‍लास रूम

इस संस्‍थान में यह दूसरा साल है। विभाग वही है और कक्षा भी वही। उतने ही प्रशिक्षु भी हैं। अब आप यह न अपने तरफ से जोड़ लीजिएगा कि बिल्‍कुल वैसे ही। वैसे वाक्‍यों का नियम जानने वाले अगले वाक्‍य का अंदाजा लगा ही लेते हैं। हां, सभी वैसे ही नहीं हैं लेकिन लगभग वैसे ही हैं। पिछले बैच से बस एक साल का अंतर है, इसलिए पीढि़यों के गैप की परिकल्‍पना तो यहां नहीं कर सकते न। पत्रकारिता से जुड़ने की अपनी इच्‍छा में सबने लगभग एक जैसा ही लिखा है - एक बेहतर दुनिया बनाने की राह में हम शामिल होना चाहते हैं। लेकिन कइयों ने ईमानदारी से यह जोड़ना उचित समझा है कि यह एक आकर्षक करियर भी है।
बहरहाल, सब वही वही के बीच एक चौंकानेवाली बात मुझे परेशान कर रही है। हर बैच में कुछ अच्‍छे छात्र होते ही हैं और कुछ गुमसुम, चुपचाप शांतिपूर्ण कक्षा चलाने के पक्षधर तो कुछ ऐसे भी होते हैं जिनका अपने पर कंट्रोल ही नहीं होता। वह हर बात पर कुछ कहना चाहते हैं। उनके पास प्रतिक्रिया करने के लिए कुछ हो या न हो। वे बिना कहे अपने को रोक ही नहीं सकते। और बहुत से ऐसे होते हैं जिन्‍हें बहुत कुछ कहना होता है लेकिन वह कुछ बोल ही नहीं पाते। वह हमेशा कक्षा की समाप्ति या फिर वह सहज एकांत ढूंढते रहते हैं जब शिक्षक के साथ कुछ कह सकें। और इनमें भी वैसे बहुत हैं जो मौका पाने के बाद भी कुछ नहीं कह पाते। कहने आते हैं कुछ और कह कुछ और जाते हैं। ऐसा क्‍यों होता है ? क्‍या इसके मनोविज्ञान में उनका स्‍कूल, उनका समाज और उनका परिवेश भी शामिल नहीं है। हमारे लोकतंत्र की षष्टिपूर्ति में भीतर ही भीतर यह कौन सा हंटर चल रहा है जो अभिव्‍यक्ति को मारे जा रहा है। मेरे सामने एक बहुत बड़ा मौन है, शायद आपलोगों के पास कुछ जवाब, कुछ अनुभव हो।