भाई साहब बीच कार्यक्रम में पहुँचे थे।
तेज़ चलकर आए होंगे। ललाट पर चमकता पसीना बता रहा था।
हॉल में पहुंचकर उन्होंने देखा। आगे की पंक्ति में कुर्सियाँ खाली हैं। उनके चेहरे से यह भाव व्यक्त हो रहा था, मानो चमत्कार हो गया हो। देर से आने के बाद भी कुर्सी मिल जाना चमत्कार ही तो माना जाएगा। वे इतमीनान से बैठ गये। लेकिन भीतर इतमीनान नहीं हो पाया था। किसी आशंका से घिरे लग रहे थे। कभी बाएँ देखें-कभी दाएँ। गायन सामने चल रहा था तो मंच की ओर देखना जरूरी ही था। बीच-बीच में पीछे भी देख रहे थे।
कुलमिलाकर उन्हें अभी भी शंका थी कि यहाँ बैठे रहा जा सकता है या नहीं। कहीं कोई बीच में आकर उठा न दे। इस पंक्ति में तो वीआइपी बैठते रहे होंगे। कहीं उनको ऐसा तो नहीं लग रहा कि गलत कार्यक्रम में आ गये। एक चमत्कार कितनी तरह की शंकाएँ अपने साथ लेकर आता है।
कार्यक्रम खत्म होने तक उनके पसीने कम नहीं हुए। एसी युक्त हॉल में पसीना उनकी स्थिति को बयान कर रहा था।
Wednesday, September 23, 2026
Saturday, August 29, 2026
कार्यक्रम के बाद
कार्यक्रम अच्छा था। कई लोग मिले। कुछ पुराने। कुछ नये परिचय बने। जो शब्द मंच से बोले ये उनकी वाहवाही हुई। ऐसा करने की रवायत है।
एक साहब जो मुख्य अतिथि थे - उन्होंने कहा था मैं मंच पर बैठे सभी लोगों के प्रति कृतघ्नना व्यक्त करता हूँ। दरअसल, वे कृतज्ञता व्यक्त करना चाह रहे होंगे। लेकिन इस भाव के लिए उनके दिमाग में वह शब्द बैठा था जिसे वे बेफिक्र होकर बोल गये।
आयोजक का रात को धन्यवाद ज्ञापन के लिए फोन आया। आजकल यह कृतज्ञता ज्ञापित करना आवश्यक हो गयी है। कार्यक्रम से पहले कई चैनलों से उपस्थित होने का न्योता और बाद में आभार व्यक्त करने फोन।
कितना मुश्किल है आजकल कोई कार्यक्रम करना।
Subscribe to:
Posts (Atom)