Sunday, April 27, 2008

एक प्रतिभा की मौत

शैक्षिक लोन पर खुद सूद चुकाने का सरकार का निर्णय पढ़ाई लिखाई में लगे आर्थिक रूप से पिछड़े युवाओं के लिए बहुत बड़ी राहत है। आर्थिक असहायता के अंधेरे में यह विकास की खिड़की की तरह है । ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जिनमें विद्यार्थी का चयन किसी अच्‍छे कोर्स में तो हुआ लेकिन फीस नहीं होने के कारण वह पढ़ाई जारी नहीं कर पाया।
एक उदाहरण मेरे पास है। इस बार गांव जाने पर मुझे पता चला कि गांव के एक मुसलिम लड़के ने यूपी पॉलीटेक्‍नीक की प्रवेश परीक्षा पास किया था। पिछले कई वर्षों में गांव से पढ़ाई करनेवालों के लिए यह बहुत बड़ी सफलता थी, मुसलिम समाज के लिए तो दुर्लभ। क्‍योंकि गांवों में जिस तरह से स्‍कूली ढांचा तहस नहस हुआ है उसमें नाउम्‍मीदी बहुत है। लेकिन इस बच्‍चे के मामले में दूसरे किस्‍म की निराशा मिली। नामांकन लेने जब वह बक्‍सर से बलिया पहुंचा तो, उसे वहां पर फीस के बारे में बताया गया, गांव में कपड़े की सिलाई कर परिवार चला रहे उसके पिता के लिए वह फीस असंभव थी। लिहाजा वह वापस लौट आया। कुछ दिनों तक गुमसुम रहा, और आखिरकार पास के कॉलेज में बी.ए. में नामांकन करा लिया। उसने इस दुर्घटना की चर्चा अपने शिक्षकों और गांव में भी अन्‍य लोगों से नहीं की। क्‍यों नहीं की यह अलग सवाल है।
जरूरतमंद लोगों के लिए कई और योजनाएं, सहायता आदि की व्‍यवस्‍था संस्‍थान, कॉलेज या यूनीवर्सिटी के स्‍तर पर होती है। यह बात चौंकानेवाली है कि आखिर पॉलीटेक्‍नीक कॉलेज ने उस विद्यार्थी को उपलब्‍ध सूचनाएं क्‍यों नहीं दी। (संभव है उसके साथ सांप्रदायिक या क्षेत्रीय पूर्वाग्रह के कारण ऐसा हुआ हो) और ऐसी सूचनाएं न तो आम लोगों के पास होती हैं और न ही उनमें इसमें आत्‍मविश्‍वास कि कुछ जिरह भी कर सकें। यह कहने की बात नहीं है कि कुछ केन्‍द्रीय संस्‍थानों को छोड़ दें तो बाकी जगहों पर इसके बारे में विद्यार्थियों को सही सलाह देने वालो कोई उपलब्‍ध नहीं होता। ग्रामीण अंचलों में तो और भी स्थिति खराब है। ऐसे में कई बार होनहार लड़कों के लिए गांव गिरांव में चंदा बेहरी का ही आसरा रहता है। लेकिन सरकार के मौजूदा कदम से संभवत: उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी।
ऐसा तभी हो सकेगा जब जरूरतमंद लोगों की सही पहचान हो। शिक्षा संस्‍थानों, क्षेत्र के बैंकों में इसके बारे में जानकारी सहजता से उपलब्‍ध हो। शैक्षिक लोन कोई नयी खबर नहीं है, इसकी व्‍यवस्‍था पहले भी थी लेकिन सूद सहित। एक खास आय वर्ग के बाद अभी भी यही व्‍यवस्‍था होगी। लेकिन सूद के साथ भी लोन निकाल पाना कठिन कसरत रही है। ऐसी खबरें आम तौर पर सुनने में मिलती हैं कि बैंक के बाबू या मैनेजर किसी बिचालिये के जरिये जारी लोन का कुछ प्रतिशत भेंट स्‍वरूप मांगते हैं। बिना भेंट के यह लोन कतई संभव नहीं होता। अब जबकि सूद सरकार चुकाएगी, ऐसी घोषणा की जा चुकी है इस भेंट का दबाव और भी बढ़ सकता है। बहुत संभव है कि जरूरतमंद लोगों की बजाय यह लोन किसी और व्‍यक्ति या धंधे के काम आने लगे।
अच्‍छा रहेगा इस अवरोध से बचाव में छात्र संगठन, स्‍वयंसेवी संस्‍थाएं और शिक्षक समुदाय तथा जरूरत मंद तबके से जुड़े अन्‍य सामाजिक संगठन इसकी निगरानी करें और जरूरतमंदों की सहायता करें। ऐसा होने से एक बड़े तबके के लिए आगे बढ़ने, हुनरमंद होने का रास्‍ता खुलेगा। किसी खुर्शीद, चमनलाल, या शरीफ को किसी अनचाही कक्षा या लेन में मन मार कर नहीं बैठना पड़ेगा।

No comments:

Post a Comment